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ब्रह्म क्या है और समृति क्या है?
कृपा करके मुझे बताइये।
वरेण्य ने कहा, हे गजानन! शुक्ल गति और कृष्ण गति क्या है,
ब्रह्म क्या है?
और संसृति क्या है,
सो कृपा करके मुझे बताइये।
।।1॥

गजानन जी ने कहा-
अग्नि, प्रकाश, दिन, श्वेतता, क्रिया और चंद्रमा ये गंतव्य हैं।

चंद्रमा प्रकाश है और धुआं रात है और दक्षिणी चंद्रमा
भगवान गणेश ने कहा,

हे राजा! अग्नि के गौरव शाली देवता और प्रकाश के गौरव शाली देवता, दिन के गौरव शाली देवता, सफेद पंखों के गौरव शाली देवता और अंत में उत्तरायण के छह-मासिक देवता को शुक्ल गति कहा जाता है,

और धुएं के गर्वित देवता,
रात के गौरवशाली देवता कहलाते हैं। ,
कृष्णा-पक्ष अभिमानी देवता, चंद्र और ज्योति अभिमानी देवता, षण्मासाभिमानी देवता को आश्रय करके जो गमन करते हैं,
वह कृष्णागति कहती है
॥ २ ॥

इन्हीं दोनों गतियों से ब्रह्म और संसार की प्राप्ति होती है,
जो कुछ यह दृश्य और अदृश्य है,
तुम इस सबको ब्रह्म जानो।
।।३ ॥

पंचमहाभूतोंको क्षर कहते हैं, उसके अनन्तर अक्षर है,
इन दोनों को अतिक्रमण कर शुद्ध सनातन ब्रह्म को जानो
॥ ४ ॥

अनेक जन्मों की संभृति (ऐश्वर्य ) को आवागमन कहते हैं।
इस संसृति को वे प्राप्त होते हैं जो मुझे नहीं गिन्ते।
॥ ५ ॥

जो मुझे सम्यक् प्रकार से उपासना करते हैं, वे परब्रह्म को प्राप्त होते हैं ध्यान पूजन और पंचामृतादि
॥ ६ ॥

तथा स्नान, वस्त्र, अलंकार, उत्तम प्रकार गंध, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, ताम्बूल, दक्षिणादि से जो मेरी पूजा करता है।
॥७॥

भक्ति तथा एकचित्त से जो मेरा भजन करता है मैं उसके मनोरथ पूरे करता हूं इस प्रकार प्रतिदिन भक्तिषसे मेरे भक्त मेरी पूजा करते हैं ॥ ८ ॥

अथवा स्थिरचित्त से मानसी पूजा करै, अथवा फल पत्र पुष्प मूल जल से।
॥ ९ ॥

जो यत्न करके मेरी पूजा करता है, वह इष्ट फल को प्राप्त होता है,
तीनों प्रकार की पूजा में मानसी पूजा श्रेष्ठ है।
॥ १० ॥

वह भी यदि कामना रहित होकर की जाय तौ अति उत्तम है, ब्रह्म चारी, गृहस्थ अथवा वान प्रस्थ या संन्यासी।
॥ ११ ॥

अथवा और जो कोई एक मेरी पूजा को करता है, वह सिद्धि को प्राप्त होता है,
और मुझे छोड कर और मुझ से देख कर जो और देवता का भक्ति से पूजन करता है ॥ १२ ॥

हे राजन् ! अथवा मेरी पूजा विधिसे न करके और देव- ताका वा मेरा द्वेष पूजन करके करता है।
॥ १३ ॥

वह सहस्र कल्प वर्ष तक नरक में पड़ कर सदा दुःख भोगता है,
प्रथम भूत शुद्ध करके फिर प्राणा याम करे।
॥ १४ ॥

फिर चित्त की वृत्तियों को आकर्षण करके न्यास करे, फिर मातृ का न्यास करे, फिर बहिरङ्ग पडङ्ग न्यास करे।
॥ १५।।

इसके उपरान्त मूलमंत्र का न्यास करके ध्यान करे और स्थिरषचित्त से गुरुषमुख से सुने मंत्र का जप करे।
॥ १६ ॥

फिर देवता के निमित्त जप को निवेदन कर अनेक प्रकार से स्तोत्र का पाठ करे इस प्रकार से जो मेरी उपासना करता है। वह सनातनी मुक्ति को प्राप्त होता है ॥ १७ ॥

जो मनुष्य उपासना से हीन है उसे धिक्कार है और उसका जन्म वृथा है, यज्ञ, औषध, मंत्र, अग्नि, आज्य, हवि, हुत यह सब मेरा ही स्वरूप है।
॥ १८ ॥

ध्यान, ध्येय, स्तुति, स्तोत्र, नमस्कार, भक्ति, उपासना, वेदत्रयीसे जानने योग्य, पवित्र, पिता मह के पिता मह यह सब मैं ही हूं ॥ १९ ॥

ॐकार, पावन, साक्षी, प्रभु, मित्र, गति, लय, उत्पत्ति, पोषक, बीज, शरण।
॥ २० ॥

इसी प्रकार असत्, सत्, अमृत, आत्मा तथा ब्रह्म यह सब मैं ही हूँ, दान, होम, तप, भक्ति, जप, वेद पाठ।
॥२१।।

यह जो कुछ भी करे सब मुझे निवेदन करदे मेरे आश्रय करने वाले स्त्री दुरा चारी पापी क्षत्रिय वैश्य शूद्रादि।
॥ २२ ॥

यह भी तो मेरा आश्रय करने से मुक्त हो जाते हैं फिर मेरे भक्तों की तौ बात ही क्या है, मेरा भक्त यह मेरी विभूति जान कर कभी नष्ट नहीं होता है ॥ २३ ॥

मेरे प्रभव (उत्पत्ति ) और मेरी विभूतियों को देवता और ऋषिभी नहीं जानते, मैं अनेक विभूतियों से विश्व में व्याप्त होकर स्थित हूँ।
॥ २४ ॥

इस संसार में जो कुछ भी सर्वोत्तम है उसी की महिमा सुनो।
इस संसार के सभी सबसे प्रतिभा शाली और उत्कृष्ट प्राणी मेरी महिमा हैं।

यह श्रीमद-भागवतम का सातवां अध्याय है, जिसे श्रीमद-भागवतम के नाम से जाना जाता है, जो उपनिषदों के सभी अर्थों का स्रोत है। ।।7॥

ॐ तत्सदित श्रीमद् गणेश योग अमृतार्थ शके गजाननवरेण्यं-

संवाद में पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र की भाषा पर टिप्पणी
यह उपासना-योग का सातवाँ अध्याय है। 7॥

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