उत्तराखंड के चमोली जिले के रानो गांव में जन्मे सुरजन सिंह भंडारी की वीरता और बलिदान की कहानी देशभक्ति की एक ऐसी मिसाल है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।
24 सितंबर 2002 को गुजरात के अक्षरधाम मंदिर पर हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। उस कठिन घड़ी में NSG (नेशनल सिक्योरिटी गार्ड) के कमांडो सुरजन सिंह भंडारी भी ऑपरेशन का हिस्सा थे। गढ़वाल स्काउट्स से NSG में डेपुटेशन पर आए सुरजन सिंह ने बिना अपनी जान की परवाह किए आतंकियों से सीधे मोर्चा लिया।
मुठभेड़ के दौरान आतंकियों की गोली उनके सिर में लगी, जो ब्रेन स्टेम में फंस गई। वे गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन उनकी बहादुरी की वजह से सैकड़ों निर्दोष लोगों की जान बचाई जा सकी। इस हमले में कई लोग शहीद हुए, लेकिन NSG कमांडोज ने आतंकियों को मार गिराकर ऑपरेशन को सफल बनाया।
घायल अवस्था में उन्हें पहले अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां कई जटिल सर्जरी हुईं। बाद में उन्हें AIIMS दिल्ली शिफ्ट किया गया। वहां वे लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रहे और करीब 600 दिनों तक कोमा में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करते रहे।
उनकी बहादुरी और अदम्य साहस को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें कीर्ति चक्र से सम्मानित किया—यह देश का दूसरा सबसे बड़ा शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है। यह सम्मान उन्हें कोमा में रहते हुए ही प्रदान किया गया था।
उस समय देश के बड़े नेताओं—तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी—ने उनके इलाज और सम्मान में विशेष रुचि दिखाई।
लगभग दो साल तक जिंदगी से जंग लड़ने के बाद, 19 मई 2004 को AIIMS दिल्ली में उन्होंने अंतिम सांस ली। उस समय उनकी उम्र मात्र 25 वर्ष थी। उनके पार्थिव शरीर के पास तिरंगा रखा गया था—जो उनके बलिदान और सम्मान का प्रतीक था।
आज भी सुरजन सिंह भंडारी की कहानी NSG, भारतीय सेना और पूरे देश के लिए प्रेरणा है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि कर्तव्य, साहस और देशभक्ति सबसे ऊपर होती है।
🇮🇳 जय हिंद, वीर सपूत को शत-शत नमन
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