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प्रायः लोगों में पजामे और उसके विभिन्न स्वरूपों को लेकर एक भ्रांति है कि इस परिधान की शुरुआत मुगलों या तुर्कों के आने के बाद हुई है। तमाम इतिहासकार और गंगा जमनी तहजीब वाले बड़े जोर शोर से कहते हैं कि कपड़े बनाना पहनना और तहजीब रेत खाने वाले कबीले लेकर आए थे।
दो हजार साल पहले जब रेत खाने वाले चमड़ा लपेटते थे, उस समय भारत के लोग सोने के कपड़े और फूलों के कपड़े पहनते थे। गुप्तकाल और पूर्व गुप्तकाल में मिली मूर्तियों के वस्त्र देखिएगा तो उसका मुकाबला आज के ड्रेस डिजाइनर क्या करेंगे, यहां तक कि ओवरकोट पहनने के प्रमाण मिले हैं। समुद्रगुप्त का एक सिक्का मिला है जिसमें वह ओवरकोट में हैं।
महिलाओं के वस्त्रों का कहना ही क्या था। चूड़ीदार पजामी के के ऊपर की कुर्ती पहने और फीते से कमर को बांधने के बाद जो सौंदर्य उभरता है उसका चित्रण एक मूर्ति के माध्यम से हमें मिलता है। इसलिए शलवार कमीज को तुर्को या मुगलों से जोड़कर देखना भारतीय वस्त्र के प्रति अज्ञानता का द्योतक है।
सूती कपड़े का इतिहास लगभग सात हजार साल से भी पुराना है। रेशम, कपास, ऊन, मूंज के कपड़े जनसामान्य में आम थे। एक और मिथ है कि यहां की महिलाओं द्वारा पारसी महिलाओं से साड़ी पहनना सीखा गया, क्या ही बकवास बात है। साड़ी भारत की वह परंपरा है जो निरंतर सनातन है। समय के साथ साड़ियां और निखर रही हैं।
जिस मुगलकाल का वर्णन करते रोमिला थापर अघाती नही थी, वह काल भारत का ' डार्क एज' था। नवाबों के नाम पर डिजाइन किए गए कुर्ते विशेष रूप से नवाब वाजिद अली शाह के वस्त्र विन्यास देखने के बाद कोई सभ्य व्यक्ति उसे पहनना नही चाहेगा।
स्वतंत्रता के बाद जो मानसिक कंडीशनिंग बनाई गई उसमें हमारी पीढ़ी तक यह मान बैठी कि सब कुछ बाहर से आया है।
खैर अब खुदाई हो रही है, जगह जगह दबे देव जागृत हो रहे हैं। एक गुप्तकाल की मूर्ति का चित्र लगा रहा हूं, उसे देखिए और सोचिए कि इससे सुंदर वस्त्र और क्या होगा!

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