🙏🙏जय सियाराम जी🙏🙏
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प्रमुदित तीरथराज निवासी।
बैखानस बटु गृही उदासी॥
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कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा।
भरत सनेहु सीलु सुचि साँचा॥
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भावार्थ:-गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि तीर्थराज प्रयाग में रहने वाले वनप्रस्थ, ब्रह्मचारी, गृहस्थ और उदासीन (संन्यासी) सब बहुत ही आनंदित हैं और दस-पाँच मिलकर आपस में कहते हैं कि भरतजी का प्रेम और शील पवित्र और सच्चा है।
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सुनत राम गुन ग्राम सुहाए।
भरद्वाज मुनिबर पहिं आए॥
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दंड प्रनामु करत मुनि देखे।मूरतिमंत भाग्य निज लेखे॥
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भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी के सुंदर गुण समूहों को सुनते हुए वे मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजी के पास आए। मुनि ने भरतजी को दण्डवत प्रणाम करते देखा और उन्हें अपना मूर्तिमान सौभाग्य समझा।
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वंदउ राम लखन वैदेही।
जे तुलसी के परम् सनेही॥
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अनुज जानकी सहित निरंतर ।
बसउ राम नृप मम उर अंतर॥
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🙏🙏जय सियाराम जी🙏🙏