"जब मैं मस्जिद जाता था तो मेरे वामपंथी दोस्तों को इससे कोई परेशानी नहीं होती थी,

लेकिन जब कोई हिंदू मंदिर जाना चाहता था तो मेरे वामपंथी दोस्त उसे सांप्रदायिक घोषित कर देते थे।"

: मोहम्मद हिलाल अहमद, लेखक

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