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बुझ गई तपते हुए दिन की अगन
साँझ ने चुपचाप ही पी ली जलन
रात झुक आई पहन उजला वसन
प्राण तुम क्यों मौन हो कुछ गुनगुनाओ
चाँदनी के फूल चुन लो मुस्कराओ
कवि विनोद शर्मा की इस अद्भुत कल्पना को साकार करते ग्रीष्म ऋतु के कुछ दृश्य।
साल के जंगल धधकने के बाद फिर उसी हरियाली से जीवन्त हो उठे हैं। दिन भर की उमस को सांझ की प्यारी हवा उड़ा कर के जा रही है। आकाश में बादल नित नई चित्रकारियां कर रहा है। प्लूमेरिया और गुलमोहर तपती गर्मी में अपनी रंगत बिखेर रहे है। रात के स्वच्छ आकाश से बरामदे में छन छन कर आती चांद की रोशनी को छोड़कर घर के अंदर जाने का मन ही नहीं करता। ऐसे ही लम्हों को साझा करने का आज दिल हुआ आपसे...
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