गंगा जल बँटवारा संधि पर पुनर्विचार: बदलते हालात, बढ़ती चिंताएँ
भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बँटवारा संधि अब एक अहम मोड़ पर खड़ी है। वर्ष 1996 में हुआ यह ऐतिहासिक समझौता, जिसके तहत बांग्लादेश को करीब 35,000 क्यूसेक पानी मिलता रहा, अब 30 साल पूरे कर 2026 में समाप्त होने जा रहा है। ऐसे में भारत ने संकेत दिए हैं कि वह इस संधि की शर्तों पर दोबारा विचार कर सकता है।
भारत में जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण, कृषि आवश्यकताओं और औद्योगिक विकास के कारण जल संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। इन्हीं घरेलू जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भारतीय अधिकारी गंगा जल संधि की अवधि और शर्तों की पुनर्समीक्षा के पक्ष में हैं। सूत्रों के अनुसार, भारत अब 30 साल की जगह 10 से 15 साल की अवधि वाला समझौता चाहता है, ताकि बदलती परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर संशोधन संभव हो सके।
इस बीच, पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौते को निलंबित करने के भारत के हालिया कदम ने भी क्षेत्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों से जुड़े मामलों में वह पुराने ढर्रे पर नहीं चलेगा। इस फैसले ने बांग्लादेश की चिंताओं को और गहरा कर दिया है।
बांग्लादेश के लिए गंगा का पानी केवल संसाधन नहीं, बल्कि कृषि, आजीविका और सामाजिक स्थिरता का आधार है। यही कारण है कि भारत के सख्त रुख और संधि की समाप्ति की समय-सीमा ने ढाका में बेचैनी बढ़ा दी है। वहां के नीति-निर्माता आशंकित हैं कि नए समझौते में पानी की मात्रा या शर्तों में बदलाव हो सकता है।
स्पष्ट है कि 30 साल पहले की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियाँ अब वैसी नहीं रहीं। गंगा जल बँटवारा संधि का भविष्य दोनों देशों के बीच संवाद, संतुलन और आपसी हितों की समझ पर निर्भर करेगा। आने वाला समय तय करेगा कि यह सहयोग नई शक्ल लेता है या जल कूटनीति में तनाव का नया अध्याय जुड़ता है।