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ठीक बकरीद के दिन बशीर बद्र चले गए।
और उनके जनाजे में कितने लोग शामिल हुए?
20 लोग
क्यों? क्योंकि भारत का मुसलमान उन्हें शायर नहीं मानता था। इनकी नज़र में शायर है इमरान प्रतापगढ़ी जो अतीक अहमद को अपना आदर्श मानता है।
मुन्नवर राणा जो हिंदुओं पर छींटाकशी करता था।
राहत इंदौरी जो कहता था किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है?
बशीर बद्र आम जनता के शायर थे।
ग़ालिब के बाद भारत में दो ही शख्स हुए हैं (मेरी नजर में) जिनके शेर हर महफ़िल में, हर सम्मेलन में, संसद में,भाषण में, तक़रीर में, जुलूस में बोले जाते हैं
एक दुष्यंत कुमार
दूसरे बशीर बद्र
जहाँ दुष्यन्त कुमार का कलाम
कौन कहता है आसमान में नहीं हो सकता है सुराख
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों
हर इंकलाबी का पसंदीदा नज़्म है
वहीं बशीर बद्र का
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
ना जाने किस गली में ज़िंदगी में शाम हो जाए
हर बिछड़ने वाले का आखिरी पयाम।।
मगर ये लोग देश को गालियां नहीं देते थे
भारत माता को डायन नहीं कहते थे इसलिए
इन्हें कोई उर्दू भाषा जानने वाला अपना नहीं मानता।
अलविदा बशीर बद्र साहब 🙏🏼
कोई हाथ भी ना मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से!
ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो!!

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