कहते हैं कि अगर हौसले बुलंद हों तो कोई भी मुश्किल रास्ता रोक नहीं सकती। श्रीकांत बोला की कहानी इसका जीता-जागता उदाहरण है। जन्म से दृष्टिहीन होने के बावजूद उन्होंने कभी अपनी परिस्थितियों को अपनी पहचान नहीं बनने दिया।
आंध्र प्रदेश के एक छोटे से गांव में जन्मे श्रीकांत को विज्ञान पढ़ने से रोक दिया गया था क्योंकि अधिकारियों का मानना था कि एक दृष्टिहीन छात्र साइंस नहीं पढ़ सकता। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और कानूनी लड़ाई लड़कर विज्ञान विषय में पढ़ाई करने वाले राज्य के पहले दृष्टिहीन छात्र बने। उन्होंने 98% अंक हासिल कर सभी को चौंका दिया।
इसके बाद उन्होंने दुनिया के प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक MIT से उच्च शिक्षा प्राप्त की और पहले अंतरराष्ट्रीय दृष्टिहीन छात्र के रूप में इतिहास रचा। पढ़ाई पूरी करने के बाद विदेश में करियर बनाने के बजाय उन्होंने भारत लौटकर Bollant Industries की स्थापना की।
आज उनकी कंपनी पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद बनाती है, 1,500 से अधिक लोगों को रोजगार देती है, जिनमें बड़ी संख्या दिव्यांग कर्मचारियों की है। श्रीकांत की कहानी बताती है कि सफलता के लिए आंखों से नहीं, सपनों और दृढ़ संकल्प से देखा जाता है।
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