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शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जीवन के लिए कुछ आवश्यक नियम बनाए गए हैं जिनका पालन करना हमारे लिए आवश्यक माना गया है। हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन में हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से सोलह संस्कारों का पालन करना चाहिए। यह संस्कार व्यक्ति के जन्म से आरम्भ होते हैं और मृत्यु तक अलग-अलग समय पर किए जाते हैं। इन संस्कारों की व्याख्या प्राचीन काल से अलग-अलग काल में कई महर्षियों ने की थी पर वर्तमान समय में जो हम १६ संस्कार की बात करते हैं तो महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास द्वारा प्रतिपादित है।
वैदिक युग में संस्कारों की संख्या बहुत अधिक थी किन्तु समय के साथ-साथ इसमें संशोधन होता गया। आप ये भी कह सकते हैं कि जैसे जैसे समय बीता और मनुष्य की व्यस्तता बढ़ी, इन संस्कारों में कमी आती चली गयी। मुख्य संस्कार रख लिए गए और गौण संस्कार छोड़ दिए गए। गौतम स्मृति में कुल मुख्य संस्कारों की संख्या ४० बताई गयी है। महर्षि अंगिरा ने २५ संस्कारों के बारे में लिखा है और अगर चल कर महाभारत काल तक महर्षि वेदव्यास ने इसे १६ संस्कारों तक सीमित किया। आज के भागदौड़ वाले समय में हम इनमे से कुछ संस्कारों का पालन ही कर पाते हैं।
कई लोगों को लगता है कि ये संस्कार केवल पुत्रों के लिए किये जाते हैं और ज्ञान के आभाव में ऐसी मान्यता बहुत समय तक रही भी है। हालाँकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। हमारे शास्त्रों में इन संस्कारों को बिना किसी लिंगभेद के पुत्र और पुत्री दोनों के लिए बताया गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि एक शीलवती पुत्री १० पुत्रों के समान है (दश पुत्र-समा कन्या यस्य शीलवती सुता)। इसके विपरीत पुत्र अगर योग्य ना हो तो कुल को नष्ट करने वाला भी हो सकता है (जिमि कपूत के ऊपजे कुल सद्धर्म नसाहिं)। इसी कारण ये सोच कर कि संतान कन्या है, उसे कभी इन संस्कारों से वंचित नहीं करना चाहिए। ये संस्कार हैं:

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