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व्याख्या:
प्रथम पंक्ति: यहाँ 'सुजान' का अर्थ है श्रेष्ठ या चतुर। भक्त पुंडरीक अपने माता-पिता के चरणों की सेवा कर रहे थे। जब स्वयं भगवान (विट्ठल) उनके द्वार पर आए, तो पुंडरीक ने अपनी सेवा बीच में नहीं छोड़ी। उनके लिए साक्षात ईश्वर से भी बढ़कर अपने माता-पिता की सेवा थी। यह संदेश देता है कि कर्तव्य पालन ही सबसे बड़ी पूजा है।
द्वितीय पंक्ति: पुंडरीक ने बिना पीछे मुड़े, पास पड़ी एक ईंट पीछे सरका दी ताकि भगवान उस पर खड़े होकर प्रतीक्षा कर सकें। भगवान उनके इस निस्वार्थ प्रेम और कर्तव्य-निष्ठा से इतने प्रसन्न हुए कि वे उस ईंट पर खड़े हो गए।

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