इक्ष्वाकु वंशी महाराज युवनाश्व संतान प्राप्ति की कामना के लिए वन में तपस्या करने गए, जहाँ उनकी भेंट च्यवन ऋषि से हुई। ऋषि ने उनके लिए एक विशाल 'इष्टि यज्ञ' किया और अंत में एक कलश में अभिमंत्रित जल रखा, जिसे पीकर महारानी को गर्भ धारण करना था।
किन्तु, नियति को कुछ और ही मंजूर था। रात्रि के समय प्यास से व्याकुल महाराज युवनाश्व ने अनजाने में वही अभिमंत्रित जल स्वयं पी लिया, जिसके फलस्वरूप वे स्वयं गर्भवती हो गए। समय पूर्ण होने पर देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों ने राजा की कोख को चीरकर एक तेजस्वी बालक को बाहर निकाला।
बालक के पोषण की समस्या उत्पन्न होने पर देवराज इंद्र ने अपनी तर्जनी उँगली उसे चूसने के लिए दी, जिससे दिव्य दुग्ध प्रवाहित हो रहा था। इंद्र ने कहा— "मम धाता" (अर्थात् मैं इसकी माता हूँ), जिससे बालक का नाम मान्धाता पड़ा। यही बालक आगे चलकर एक महान चक्रवर्ती राजा बना।