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सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि वसीयतकर्ता (Testator) की मृत्यु के तीन वर्ष के भीतर ही प्रोबेट (Probate) के लिए आवेदन करना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि प्रोबेट के लिए आवेदन करने का अधिकार तब उत्पन्न होता है, जब वसीयत के आधार पर बनी कानूनी स्थिति को चुनौती दी जाती है या प्रोबेट की वास्तविक आवश्यकता पैदा होती है, न कि केवल वसीयतकर्ता की मृत्यु की तारीख से।

यह फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने Sanjay Sharma @ Sanjay Bhardwaj v. Krishnadhan Khaware & Ors. मामले में सुनाया।

मामले में वसीयत 15 अप्रैल 1995 को बनाई गई थी और वसीयतकर्ता का निधन 7 जून 1995 को हुआ था। प्रोबेट के लिए आवेदन 31 अगस्त 2005 को दायर किया गया। प्रतिवादियों ने यह कहते हुए आवेदन को चुनौती दी कि यह तीन वर्ष की सीमा अवधि के बाद दायर किया गया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि प्रोबेट की आवश्यकता 8 अगस्त 2005 को उत्पन्न हुई, जब वसीयतकर्ता की पत्नी ने General Power of Attorney निष्पादित की। इसलिए 31 अगस्त 2005 को दायर किया गया प्रोबेट आवेदन समय-सीमा के भीतर था।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि Indian Succession Act, 1925 में प्रोबेट आवेदन के लिए कोई विशेष समय-सीमा निर्धारित नहीं है। ऐसे मामलों में Limitation Act, 1963 के प्रावधान लागू होंगे, लेकिन तीन वर्ष की अवधि की गणना उस दिन से होगी, जब प्रोबेट की वास्तविक आवश्यकता उत्पन्न होती है। साथ ही, कोर्ट ने P. Kumarakurubaran v. P. Narayanan, 2025 LiveLaw (SC) 509 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि लिमिटेशन का प्रश्न विवादित तथ्यों पर आधारित हो, तो उसे Order VII Rule 11 CPC के स्तर पर सरसरी तौर पर खारिज नहीं किया जा सकता।

इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और झारखंड हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए मामले को आगे की सुनवाई के लिए संबंधित सिविल कोर्ट को वापस भेज दिया।

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