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'येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वां प्रतिबध्नामि, रक्षे! मा चल! मा चल!!'
​रक्षाबंधन के इस पावन और प्राचीन मंत्र का इतिहास और इसका कारण भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ा है, जो रामायण काल से भी प्राचीन है।
​इस मंत्र की रचना की कथा भगवान विष्णु द्वारा राजा बलि से सब कुछ दान में मांगने से शुरू होती है। जब राजा बलि को उनकी चाल का ज्ञान हुआ, तब उन्होंने भगवान से पाताल में निवास करने का वरदान मांगा। भगवान विष्णु राजा बलि के साथ पाताल लोक चले गए, जिससे माता लक्ष्मी अत्यंत दुःखी हुईं और भगवान को उस बंधन से मुक्त कराने के उपाय सोचने लगीं।
​माता लक्ष्मी ने वेष बदलकर राजा बलि के पास जाकर उन्हें अपना मुंहबोला भाई बना लिया। सावन पूर्णिमा के दिन उन्होंने राजा बलि को राखी बांधी। जब राजा ने राखी के बदले उपहार मांगने को कहा, तो देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को वचन से मुक्त करने का आग्रह किया। बलि ने वचन निभाते हुए भगवान को मुक्त कर दिया और वे माता लक्ष्मी के साथ बैकुंठ लौट आए।
​रक्षा सूत्र के इसी ऐतिहासिक महत्व और राजा बलि को राखी बांधकर भगवान विष्णु को मुक्त कराने की घटना के स्मरणस्वरूप इस मंत्र की रचना हुई, जिसे परंपरा के अनुसार सदियों से मनाया जा रहा है।
​सनातन धर्म में आस्था रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को रक्षाबंधन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। आइए इस पावन अवसर पर अपने परिवार, समाज, संस्कृति और पर्यावरण के प्रति अपने दायित्वों को समझें और उन सभी मूल्यों की रक्षा करने का दृढ़ संकल्प लें जो हमारे जीवन का आधार हैं।💐
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