हरयाणा में महर्षि दयानंद जी का शुभ आगमन
महर्षि दयानंद जी पंजाब में वेद व्याख्यान के पश्चात वापस लौट रहे थे , तो १७ जुलाई , १८७८ को वे अम्बाला रुके थे । यद्यपि वे अधिक समय वहाँ नहीं ठहरे , पर अपने स्वल्प निवास का उपयोग उन्होंने धर्मचर्चा में किया , जिससे अम्बाला के लोग बहुत प्रभावित हुए । पर अभी वहाँ आर्यसमाज की स्थापना नहीं हुई । अम्बाला के अतिरिक्त हरयाणा का केवल एक नगर और था , जहाँ महर्षि ने पदार्पण किया था । यह नगर रिवाड़ी था , जहाँ महर्षि जयपुर से दिल्ली आते हुए २५ दिसम्बर , सन् १८७८ को पधारे थे , और जहाँ उन्होंने ९ जनवरी , १८७९ तक निवास किया था । हरयाणा में केवल रिवाड़ी को ही यह गौरव प्राप्त है , कि वहाँ महर्षि दो सप्ताह से भी कुछ अधिक समय ठहरे और वहाँ उन्होंने वैदिक धर्म के प्रचार के लिए अनेक व्याख्यान दिये । लार्ड लिटन ने १ जनवरी , १८७७ को दिल्ली में जो दरबार आयोजित किया था , रिवाड़ी के प्रतिष्ठित रईस व जागीरदार राव युधिष्ठिरसिंह भी उसमें गये थे । महर्षि भी उस अवसर पर दिल्ली पधारे हुए थे । राव युधिष्ठिर सिंह ने उनसे भेंट की और उनके प्रवचनों को सुनकर तथा उनसे बातचीत कर बहुत प्रभावित हुए । उन्होंने महर्षि से रिवाड़ी पधारने के लिए भी अनुरोध किया । उस समय तो महर्षि रिवाड़ी नहीं जा सके , पर राव युधिष्ठिरसिंह के बार - बार जोर देने पर वे सन् १८७८ के अन्त में वहाँ गये , और अपने दो सप्ताह के लगभग के निवास में उन्होंने वहाँ ११ व्याख्यान दिये । राव युधिष्ठर सिंह ने अपने सम्बन्धियों तथा उस क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को महर्षि के व्याख्यान सुनने के लिए आग्रहपूर्वक निमन्त्रित किया था , जिसके परिणामस्वरूप रिवाड़ी तथा उसके समीप वर्ती प्रदेश में वैदिक धर्म के प्रति लोगों में आस्था उत्पन्न हो गई थी । राव युधिष्ठिर सिंह स्वयं भी महर्षि के अनुयायी बन गये थे , और पण्डित ठाकुरसिंह आदि अपने सहयोगियों के साथ वैदिक धर्म का प्रचार करने के लिए तत्पर हो गये थे ।

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