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उत्तराखंड का कैंची धाम बाबा नीम करोली महाराज से जुड़ी आस्था की बड़ी जगहों में से एक है, लेकिन इसके बनने की कहानी बेहद खास है। 1942 में पूर्णानंद तिवारी की बाबा नीम करोली महाराज से पहली मुलाकात हुई थी। उस समय बाबा ने उनसे कहा था कि वे उन्हें पूरे 20 साल बाद दोबारा देखेंगे। 25 मई 1962 को यह बात सच हुई, जब बाबा कैंची गांव पहुंचे और पूर्णानंद तिवारी से फिर मुलाकात हुई। इसके बाद बाबा ने क्षिप्रा नदी के दूसरी ओर स्थित जंगल में जाकर एक शिला पर बैठकर इस जगह को आश्रम के लिए चुना।

पुरानी यज्ञशाला के स्थान पर निर्माण शुरू हुआ और धीरे-धीरे हनुमान मंदिर समेत कई मंदिर और आश्रम तैयार होते गए। खास बात यह है कि कैंची धाम का निर्माण किसी पेशेवर आर्किटेक्ट या तैयार नक्शे के आधार पर नहीं हुआ।

श्री कैंची धाम मंदिर ट्रस्ट के मुताबिक, निर्माण बाबा के निर्देशों के अनुसार आगे बढ़ता रहा। बाद में यहां लक्ष्मी नारायण, शिव परिवार और अन्य मंदिरों के साथ अद्वैत आश्रम भी बनाया गया। 15 जून को धाम का मुख्य उत्सव मनाया जाता है और इसी तारीख को बाबा नीम करोली महाराज की प्रतिमा की स्थापना का फैसला भी लिया गया था।

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