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"सनातन संस्कृति जनित आचरण
बचपन से ही अगर गलती से भी कोई वस्तु पैर को छू जाए तो हम माथे को लगा लेते" हैं...रुपया, पैसा, किताब कॉपी ही नहीं बल्कि झाड़ू तक को पैर लग जाए तो हम सर से छुआते हैं।
किसी इंसान को गलती से पैर टच हो जाए तो हम उस पैर को धोक लगाते हैं। अभी हाल ही में एक वीडियो देखा जिसमे रितेश देशमुख का किसी इंटरव्यू के दौरान अनजाने में ही पैर उनकी धर्मपत्नी जेनेलिया को छू गया। उस बन्दे ने न कैमरे की परवाह की न जगह की...न यह सोचा कि मैं मर्द हूँ और न यह बात कि यह बन्दी तो पत्नी है मेरी...उस पर पैर लगना इतनी बड़ी बात भी नहीं!
रितेश ने समस्त किन्तु परन्तु से परे जाकर जेनेलिया के पैर को छू कर अपने सर से लगा लिया...क्योंकि यही उनके संस्कार हैं।
उस एक पल में रितेश ने उन समस्त पुरुषों का मान बड़ा दिया जो अपनी पत्नी को अपनी 'बेटर हाफ' समझते हैं...और उन नारीवादियों को उफ्फ तक न करने दिया जो एक पुरुष को बस शोषक दृष्टि से देखती हैं।
मुझे यह देखकर खुशी हुई...स्त्री पुरुष के मायने से नहीं बल्कि हमारी संस्कृति और हमारे धर्म के मायने से। क्योंकि हम कण कण में ईश्वर की उपस्थिति को मानते हैं।
खैर...
यह चित्र देखकर निराशा हुई...आस्ट्रेलिया वालों के लिए यह महज एक जीत की ट्रॉफी होगी, और उन्हें उसपर पैर लगाने को लेकर ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ होगा। उनके लिए यह सामान्य सी बात होगी।
पर कल हमारे देश के 100 करोड़ से ज्यादा लोग इस ट्रॉफ़ी के लिए अपने ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे...और यह अगर हाथ मे आ जाती तो आज सिर माथे पर बैठाई जाती और न जाने कितने बुजुर्गों का आशीर्वाद फलीभूत होता इससे।
यही अंतर है भारत और शेष विश्व मे।
यह देखकर दुःख हुआ। बस यही हम कह सकते हैं और कुछ नहीं...!
बाकी तो....
👏🌹👏
साभार

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