आदरणीय Ravishankar Singh जी की कलम से
नमन देव तुल्य बाऊ जी ( डॉ साहब के पिताजी को )
जंहा तक मुझे याद है। धर्म , दर्शन पर यह हमारी उनकी अंतिम वार्ता थी। जो मुझे प्रतिदिन याद आती है। इससे मैं बहुत प्रभावित भी हुआ था।
मैंने पिताजी से पूछा। इस संसार में इतना दुख, पीड़ा, कष्ट क्यों है। जबकि मनुष्य तो विकास ही किया है।
वह थोड़ी देर तक मौन रहे। बोले यह प्रश्न इतना सरल नही है। ऐसे प्रश्नों की खोज में बुद्ध, महावीर को गृह त्याग करना पड़ा।
लेकिन जो तुम मुझसे जानना चाहते हो। वह मैं बता रहा हूँ। वही सनातम सत्य है।
वह अपनी बात एक कथा से शुरू करते है।
जब लंका में युद्ध समाप्त हो गया। भगवान राघवेंद्र एकांत कुटिया में चिंतित अवस्था मे बैठे थे।
ईश्वर कि मनोदशा देखकर ब्रह्मांड कि सभी शक्तियों में हलचल पैदा हो गई।
मर्यादापुरुषोत्तम का चिंतन वही है। जो तुम्हारा प्रश्न है। वह यह सोच रहे थे। मनुष्य को क्या हो गया है।
सर्वप्रथम ब्रह्मा जी उनके सामने प्रकट हुये। वह जो कह रहे हैं। वही उपनिषदों का भी निहतार्थ है। जिसे गोस्वामीजी बहुत सरलता से लिखतें है।
अब दीन दयाल दया करिये
मति मोरी विभेदकरी हरिये।
जेहिते बिपरीत क्रिया करिये,
दुख सो सुख मान सुखी चरिये।।
तो ब्रह्मा जी कहते है।
लगता है प्रभु मुझसे गलती हो गई है। यह मनुष्य कि बुद्धि में विभेद पैदा हो गया है।वह दुख को सुख मानकर जीवन जीता है। इस विभेद को प्रभु ठीक कर दीजिये।
#पिताजी कहते है। जिसे तुम दुख मान रहे हो। क्या वह दुख ही है। जिसे तुम अपना कहते हो। क्या वह तुम्हारे अपने ही है।
क्या तुम्हारा चिंतन ठीक है। या तुम्हारी पीड़ा, दुख, कष्ट यह सब तुम्हारी बुद्धि ने कृतिम रूप से पैदा किया है।
यह जो कार लिये हुये हो। तुम्हे कैसे लगता है। यह सुख का साधन है। इस भौतिक जगत में कुछ भी सुख नही दे सकती हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नही है। कि त्याग दो।
उससे बंध मत जाओ। यह सब कुछ साधन है।
साध्य तो एक ही है। वह ईश्वर ! उसी से सुख , आनंद है।