सबको पश्चाताप है।
मनुष्य क्या पैगंबर तक को पश्चाताप है। ईसा ने तो कन्फेशन कि पूरी व्यवस्था बना दिया।
पापी बनकर पाप स्वीकार कर लो। हम क्षमा कर देंगें।
संसार के दर्शन, दार्शनिक, नियम, कानून पश्चाताप से भरे पड़े है।
जब तक पश्चाताप नही होगा। तब तक कोई झुक नही सकता है। वह दास नही बन सकता है।
यही कारण है। संसार की एक तिहाई जनसंख्या को ईसाइयत ने दास बना दिया।
'वह गॉड , वह मजहब जो इतने दास बना दिया। उसे नष्ट हो जाना चाहिये। गॉड मर चुका है।' नीत्से का यही तर्क है।
मात्र कृष्ण है। जिन्होंने कभी भी पश्चाताप का उपदेश नही दिया। उन्होंने स्वंतत्रता कि शिक्षा दी। तुम को स्वीकार कर लो! तुम जैसे हो। तुम्हें किसी के सम्मुख झुकने कि आवश्यकता नही है।
एक महाअपराधी भी स्वयं को मुक्त करके मेरे पास आता है। तो वह पुण्यात्मा जितना ही मुझे प्रिय है।
यदि कोई धर्म भी बाधा बनता है। तो उसे त्याग दो। मेरी शरण मे आओ।
पाप पुण्य, अच्छा बुरा सब इसी जीवन का हिस्सा है। जो पाप पर पश्चाताप करता है। वह और भी पापी बनता है। सुबह जैसे शराब को बुरा कहता है। शाम को ठेके पर पहुँच जाता है। यह सिलसिला जीवन भर चलता ही रहता है।
नहीं ! पश्चाताप समाधान नही है। स्वंतत्र होना ही समाधान है। स्वंत्रता का अर्थ शरणागति है।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणम व्रज।