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राजपूतों को सदा छल से हराया जाता रहा है , आखिर कब तक चलेगा कब होगा हमारा यह समाज जागृत और एक ?
गुलाल की कुछ पंकतियां आज के परिपेक्ष में याद आती है :
एक बखत की बात बताएँ, एक बखत की
जब शहर हमारो सो गयो थो, रात गजब की
चहूँ ओर सब ओर दिशा से लाली छाई रे
जुगनी नाचे चुनर ओढ़े खून नहाई रे
सब ओरो गुल्लाल पुत गयो बिपदा छाई रे
जिस रात गगन से खून की बारिश आई रे
जिस रात सहर में खून की बारिश आई रे

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