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बहरों के कानों में आज–कल शोर उतर जाता है।
जो नहीं कर पा रहे चोरी उन्हें चोर नज़र आता है।।
अंधों को चोर भी रिश्वत का कौर नज़र आता है।
जो कल तक था आज भी वही दौर नज़र आता है!!
रजनीश दुबे "धरतीपुत्र"

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