बिहार सरकार ने वहाँ के एक मंदिर में पशुबलि पर प्रतिबंध लगा दिया है ऐसा बताया जा रहा है। इस प्रतिबंध का विरोध करने वालों द्वारा बलिप्रथा के पक्ष में विभिन्न तर्क दिये जा रहे हैं:
1. पशुबलि का वेदों में भी विधान है।
2. वैष्णव बलि नहीं देते, ये शैवों की परंपरा है। माँ काली को रक्त का ही भोग लगता है आदि आदि।
3. ये हमारी सदियों पुरानी परंपरा है।
4. सरकार कौन होती है हमारी परंपराओं पर प्रतिबंध लगाने वाली?
वेदों की बात करें तो वेदों में सत्व, रज, तम तीनों गुणों और इनकी क्रियाओं का वर्णन है। वेदज्ञ राक्षसराज रावण ने वेदों के तम को अपनाकर तामसिक क्रियाएँ ही की। यदि आप तामसिक आराधना करना चाहें, तामसिक जीवन पद्धति अपनाना चाहें तो अवश्य करें लेकिन इसे सत्व सिद्ध करने का प्रयास ना करें। यदि आप में वेदों के तत्पर्य को समझने की इतनी ही बुद्धि है तो आप वेदों के आयुर्वेद, धनुर्वेद आदि विज्ञानों का अनुसंधान क्यों नहीं करते जिनका उपयोग मानव कल्याण के लिए किया जा सकता है।
मैं न तो वैष्णव हूँ और न ही शैव; मैं परम वैष्णव शिव और परम शैव हरि का उपासक हूँ। वस्तुतः शिव और हरि एक ही तत्व हैं। जैसे आप एक व्यक्ति होने के बाद भी अपने माता-पिता के लिए पुत्र, भाई-बहनों के लिए भाई, पत्नी के लिए पति और संतान के लिए पिता हैं आदि। ईश्वर में भेद करना ही पतनमार्ग पर पहला कदम रखना है।
परमपिता परमात्मा ने माँ काली का रूप लेकर अपने रौद्र रूप में असुरों का रक्तपान किया था जिसका उद्देश्य असहाय प्राणियों की रक्षा का था। आप असहाय मूक पशुओं की बलि देकर काली माता की ममता का अपमान ही कर रहे हैं क्योंकि जैसे आप माँ काली की संतान हैं वैसे ही वो असहाय पशु भी उनकी ही संतान हैं। माता कभी भी अपनी एक संतान द्वारा किसी दूसरी संतान को अकारण कष्ट देते देखकर प्रसन्न नहीं हो सकतीं। ईश्वर, सूर्य और अग्नि को अपवित्र वस्तु से संसर्ग होने पर भी दोष नहीं लगता। भगवान ने समय-समय पर श्रृष्टि के कल्याण के लिए विभिन्न लीलाएँ की हैं लेकिन हमारे लिए ईश्वरीय लीलाओं का अनुसरण करना संभव नहीं, हमें उनकी दी हुई शिक्षाओं का ही पालन करना चाहिए।
परंपरा की बात पर गुरमुख से सुनी एक कथा याद आती है।
एक मंदिर के द्वार पर एक बिल्ली का बच्चा कहीं से आ गया तो वहाँ के वृद्ध पुजारी जी ने उस बच्चे को मंदिर में ही शरण दे दी। जब पुजारी जी सेवा - आरती करते थे तब बिल्ली के इधर-उधर दौड़ने से बाधा आती थी सो पुजारी जी आरती के समय इसे एक खंभे से बांधने लगे। वृद्ध पुजारी जी के धाम पधारने के बाद नये पुजारी जी भी बिल्ली को खंभे से बांधकर ही सेवा-आरती करते थे। कुछ समय बाद बिल्ली भी सद्गति को प्राप्त हुई लेकिन सभी परेशान कि अब खंभे से किसको बांधा जाये क्योंकि बिल्ली को खंभे से बांधकर आरती करना एक परंपरा बन गई थी। गाँव वालों ने परंपरा की रक्षा करते हुए एक बिल्ली खोजी और उसे खंभे से बांधकर आरती हुई।
परंपराओं का पालन अवश्य होना चाहिए पर ऐसी बिल्ली को खंभे से बांधकर आरती करने वाली परंपराओं की जड़ में जाकर उन्हें समझना भी आवश्यक है।
सरकारों की बात करें तो लगभग सभी सरकारों ने ऐसा बहुत कुछ किया है जो हमारी सनातन संस्कृति के विरुद्ध है पर क्या हम उन विषयों के प्रति भी इतने ही जागरूक हैं? बिहार के कई क्षेत्रों में हिंदू मोहर्रम के ताज़िये उठाते हैं और इसके जुलूस में सम्मिलित होते हैं। पूरे देश में हिंदू मज़ारों पर माथा टेकने जाते हैं, भारत के अधिकांश मंदिरों में एक कसाई चाँद मियाँ को साईं बाबा बनाकर हमारे ईश्वर के निकट बैठा दिया गया है। इन सबका हमारे सनातन से क्या संबंध है? पहले आप अपने आपको तो दुरुस्त कीजिए, लोकतंत्र में सरकार को जनता के हिसाब से चलना ही पड़ेगा क्योंकि अभी तक हम अल्पसंख्यक नहीं हुए हैं।