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सभी मानस प्रेमी भक्त जनों सादर जय श्री राम 🚩🚩🙏🙏
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श्रीरामचरितमानस में सीता-स्वरूप- निरूपण
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गिरा - अरथ, जल - बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
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इस दोहे में सीताराम की दर्शित भिन्नता को तत्त्वार्थ में अभिन्न सिद्ध किया गया है।तत्त्व न जाननेवालों को दो भासते दीखते हैं पर मर्मज्ञ अभिन्न जानता है। कालिदास कहते हैं –
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वागर्थविव संपृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौ।।
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यहाँ का वागर्थ ही मानस का 🌹“गिरा अरथ” 🌹है।शब्द और अर्थ भिन्न लगते हैं परंतु भिन्न हैं नहीं।जल और पानी भिन्न होते हुए भी तत्त्वतः अभिन्न हैं।
इसी प्रकार जल और लहर भिन्न दिखता है परंतु परस्पर अभिन्न है।
यहाँ पहला श्रव्य है तो दूसरा दृश्य है।इन दो उदाहरणों से अभिन्नता की पुष्टि की गई है।
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तात्पर्य यह है कि वाणी स्वरूपा सीताजी के लिए एकमात्र श्रीराम ही सार्थक यानी अर्थपूर्ण हैं।निरर्थक शब्द का अस्तित्व नहीं होता।सीता का अर्थ राम से ही ध्वनित होता है और राम का सीता से। समुद्र में चंद्रमा की तरह श्रीरामचंद्र से ही सीता तरंगायित होती हैं।जल लहर के संबंध की संपूर्णता की तरह ही सीताराम हैं।कोई एकाकी नहीं रमता है।सीताजी स्वयं कहती हैं-
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प्रभु करुणामय परम बिबेकी।
तनु तजि रहति छाँह किमि छेकी।।
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प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई।
कहँ चंद्रिका चंद तजि जाई।।
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यही है सीताराम की अभिन्नता।
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गिरा अरथ दृष्टांत में गिरा मुख्य है और अर्थ उसके साथ रहता है।यहाँ गिरा यानी सीताजी मुख्य हैं और रामजी गौण सिद्ध होंगे।इसीलिए दूसरे उदाहरण में जल पुंलिंग है अतः रामजी का वाचक है और वीचि स्त्रीलिंग हो जो सीता जी के लिए है। अर्थात् यहाँ राम मुख्य हैं और सीताजी गौण।सच भी है जल से लहर पैदा होती है, लहर से जल नहीं।इस प्रकार दोनों उदाहरण से सीताराम की संपूर्ण अभिन्नता दर्शायी गयी है।
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संत मानते हैं कि यहाँ दोनों के “पद” की अभिन्नता दर्शायी गई है।भगवान् श्रीराम के दाँयें पैर के चिह्न सीताजी के बाएँ पैर में हैं और इसी प्रकार बाएँ पैर का दाएँ पैर में।यह अभिन्नता दोनों के पद की है।अतः “बंदउँ सीता राम पद”कहते हैं।
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बाह्यदृष्टि से तो श्रीसीताजी के वियोग में श्रीराम का रुदन प्रतीत होता है, किन्तु तत्त्वदृष्टि से दोनों कभी -कभी पृथक होकर विप्रलंभ शृंगार का अनुभव करते हैं।श्लोक में आत्माराम का अर्थ है श्रीसीतारमण; क्योंकि श्रीसीताजी श्रीराम की स्वरूप-शक्ति आत्मा हैं-
🌹सीतायाः स्वरूपशक्तित्वेनात्म भूतत्वात्।🌹
इस प्रकार भागवत के सभी व्याख्याकारों ने अपनी -अपनी व्याख्याओं में श्रीसीताराम तत्त्व का विशद विवेचन किया है।
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प्रकृति( सीता) का पुरुष (श्रीराम) से पार्थक्य असह्य होता है।शक्ति और शक्तिमान दोनों परस्पर आश्रय-आश्रयी भाव से युक्त हैं।प्रकृतिभूता शक्ति की झाँकी श्रीराम की प्राकृतिक उपादानों में होने लगती है।ये जिज्ञासा करने लगते हैं-
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हे खग हे मृग मधुकर श्रेणी।
तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।।
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क्या द्रव्य और गुण परस्पर पृथक रह सकते हैं? यदि नहीं तो श्रीराम और सीताजी कैसे पृथक हो सकते हैं।हनुमानजी ने श्रीराम के इसी प्रेम तत्त्व को सीताजी से अशोक बाटिका में कहा था-
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तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।
जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।
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सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं।।
जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं।।
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इसीलिए अयोध्यावासी भी यही कहते हैं-
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जनकसुता समेत रघुबीरहि।
कस न भजहु भंजन भव भीरहि।।
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‼️🚩जय श्री राम 🚩🙏🙏🙏

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