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मुन्तख़ब उत तवारीख में अकबर का दरबारी लेखक व हल्दीघाटी युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी अब्दुल कादिर बदायुनी ने लिखा है कि
"राणा से जंग के बाद राजा मानसिंह की कमान में हम सभी दर्रे से गोगुन्दा पहुंचे। वहां राणा के महलों और मंदिरों की हिफाज़त करने वाले कुछ लोग थे, जिनकी गिनती 20 थी। अपने पुराने रिवाज़ और इज़्ज़त को ध्यान में रखते हुए ये लोग अपनी-अपनी जगहों से बाहर निकले और लड़ते हुए मारे गए। हम सबको यह ख़तरा लग रहा था कि रात के वक़्त कहीं राणा हम पर टूट न पड़े, इस ख़ातिर हमने सब मोहल्लों में आड़ खड़ी करवा दी और गोगुन्दा के चारों तरफ खाई खुदवाकर इतनी ऊंची दीवार बनवा दी कि कोई घुड़सवार भी उसे फांद न सके। तब जाकर सबको तसल्ली हुई। हमारे पास खाने को कुछ नहीं था, चौतरफा दीवार बनने के बाद हम सब कैदियों की तरह दिन बिताने लगे"
(इस पेंटिंग में अकबर के सिपहसलारों को भूख से व्याकुल दिखाया गया है और पीछे उनके द्वारा एक दीवार बनवाई जा रही है)

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