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महाराणा राणा प्रताप के अलावा सभी कायर राजा थे प्रताप को मीनाओ पर ही विस्वास रहा। (प्रताप की आत्मकथ्य में विवरण)
मैं शीस क्षत्री रो लिया फिरूं, पण धड मेरो भीलां दल है।
बादल में ज्युं बिजली चमके, ऐसो मेरो मीणा दल है ।।
म्है देख लिया रजपूतां ने, कहता ही लाज शरम आवे।
म्हे गाली देतो थकुम नहीं, ऐंड्योडी मूंछ कयां भावे ।।
कुणसा लोहु री बात करूं, लज गयो खून रजपूतां रो।
अब खून बच्यो है एक धरा, भीलाम अर मीणां पूता रो।।
महाराणा प्रताप ने जब हल्दी घाटी का युद्ध लडा और हारने लगे तब झाला नाम के उनके एक मीणा सांमत ने उनका मुकुट धारण कर उन्हें युद्ध क्षेत्र से भागने का मौका दिया था ।
झाला को राणा समझ मुगल, वैरी उस पर टूट पडै
इस युद्ध में महाराणा प्रताप की हार इसलिए हुई थी क्यौकि तमाम राजपूत मुगल सेना में थे ,मेवाड़ पर मुगलौ का अधिकार हो गया । जब महाराणा प्रताप जंगलौ में भटक रहे थे तब मुगलौ की सत्ता के साथ अधिकांश राजपूतों को राजा मानसिंह ने अकवर से जोड दिया ।
एसे समय पर राजस्थान की लडाकू कौम मीणा ने राणाप्रताप का साथ दिया । महाराणा को धन देकर सेना गठित कराने बाला भामा शाह भी मीणा समाज का ही था ।
फिर महाराणा प्रताप की सेना में अग्रिम पक्ति में सदैव मीणा सैनिक ही लढै ।
मीणा जाति हमेशा से ही दयालु , उधार दिल, दुसरो कि सहायता करना ओर ज़बान के पक्के रहें हैं
आज भी महाराणा प्रताप के वंशज मीणाओं कों‌ बहुत ही सम्मान की नजरों से देखते हैं वह बहुत आदर करते है।
॥ॐ॥
हर हर महादेव 🚩 जय आदिनाथ
#क्षत्रिय_मीणा_महासभा

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