2 jr - Vertalen

कलकत्ता अंग्रेजों की राजधानी थी। बंगाल ईसाई मिशनरियों का गढ़ था। वह धर्मपरिवर्तन के लिये गरीबी, चमत्कार का सहारा ले रहे थे।
लेकिन उसी समय बंगाल में एक महान भक्त रामकृष्णजी परमहंस का प्रादुर्भाव हुआ था। मिशनरी उन्हें बाधक समझने लगी। एक योजना के तहत उन्हें अपमानित करने कि योजना बनी।
परमहंस जी प्रातः गंगा स्नान जाते थे। जनसमुदाय उनका दर्शन करता था। आज प्रातः जब परमहंस जी गंगासागर स्नान हेतु आये तो पादरियों का एक समूह उन्हें रोक लिया।
उन्होंने परमहंस जी से कहा हम लोग आपकी धार्मिक शक्ति को देखना चाहते हैं। उनमें से एक पादरी परमहंस जी से कहा।
मैं गंगा को पैदल ही पार कर जाऊँगा। यह मेरे यशु का प्रभाव है। क्या आप पार कर सकते हैं ?
परमहंस जी ने उस पादरी से पूछा तुमने यह चमत्कार सीखने में कितने वर्ष लगाये ?
पादरी बोला 17 वर्ष लगे हैं।
माँ काली के परमभक्त परमहंस जी ने अपनी पोटली से 50 पैसे निकाले और पादरी को दिया।
बोले तुमने ईश्वर के नाम पर जीवन के 17 वर्ष व्यर्थ कर दिया। तुम्हें पता भी है धर्म क्या है ! वह नाव है, मछुआरे को 50 पैसे देकर गंगा पार कर जाओ। भगवती वंदना करते हुये परमहंस जी आगे बढ़ गये।
ओशो यह प्रसंग अपने प्रवचन में बोलते हुये कहते हैं। जो धर्म को जानते ही नही। वह रोग, गरीबी, चमत्कार के नाम धर्म परिवर्तन करा रहें है। यह धर्म परिवर्तन नहीं है।
यह उन गरीब लोगों को धर्महीन करना है। जिनके पूर्वजों ने धर्म अन्वेषण में युगों तक साधना किया है।।