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व्यक्ति एक राष्ट्र के साथ एक संस्कृति में जन्म लेता है। संस्कृति कोई स्थूल निरंतरता नही है। वह विविध सहायक धाराओं के साथ मुख्य धारा में निरंतर प्रवाहित होती है। जैसे गंगा में मिलने वाली असंख्य नदियां उसके अस्तित्व को बनाये रखती है।
ऐसे ही भारतीयता वह संस्कृति है। जिसमें धर्म के विभिन्न दर्शन, सम्प्रदाय समाहित है। कला के विवधरूप उसका सौंदर्य बढ़ाते है। स्वस्थ परम्पराएं उसे अतीत से जोड़े रहती है।
स्थापत्यकला भारतीय संस्कृति का सबसे उजला पक्ष है। उसमें शैलियों कि विविधता उसे सुंदर बनाती है। इसको मंदिरों के निर्माण में देखा जा सकता है।
हम हीनता से ग्रसित लोग थे। जैसा कि विवेकानंद जी ने कहा था। वह स्वंतत्रता महत्वहीन है। जो हीनता के भाव के साथ मिलती है। यह हमारी हीनता ही थी। हम अपने अतीत और संस्कृति से घृणा करने लगे। नकलची होकर वीभत्सरूप से अपनी संस्कृति का विनाश करने लगे।
जिनके पूर्वजों ने विश्वप्रसिद्ध मंदिरों, राजमहलों, बिहारो का निर्माण किया था। उनकी संततियों ने सीसे के घर, कंक्रीट के मंदिर, कटीली चहारदीवारी बनाई। इससे अधिक किसी संस्कृति का पतन क्या होगा। जिसका आभास भी हमें नही था।
अयोध्या में जब रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट पर नागरशैली के निर्माण हुये तो उत्साही लोग हिंदू प्रतीक बताये। कथित बुद्धिजीवी इसे हिंदूवादी सरकार का कृत्य कहा।
थोड़ा ठहर का हम चिंतन न कर सके कि हमनें क्या खो दिया। जो स्थापत्यकला, वास्तुकला भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग थी। वह उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कि जा रही है। यह ऐसे ही जैसे हमनें मोटे अनाज खाने छोड़ दिये। तो सुपरफूड बन गये।
स्वतंत्र भारत में तो सभी निर्माण ऐसे होने चाहिये थे। जो भारतीय संस्कृति कि विविधता और उसकी परंपरा को प्रतिबिंबित करते। लेकिन ऐसा नही हुआ।
अयोध्या के निर्माण या तमिलनाडु में एयरपोर्ट कि द्रविड़ शैली को देखकर यह पीड़ा नही होती कि सभी एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, विश्वविद्यालय आदि सार्वजनिक निर्माण ऐसे ही होने चाहिये थे।
किसी भी संस्कृति का विनाश वहसी आक्रमणकारियों के हमले से अधिक, उत्तराधिकारियों कि अनास्था से होती है।
अब जगे हैं तो प्रशंसनीय है।

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