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© असलियत यही है।
आप जानते भी हो अच्छे से यह सब
बावजूद इसके भी --- हम बार बार इसे कहते रहेंगे और भांति भांति के संदर्भों, घटनाओं व दृष्टांतों के सहारे इसे निरूपित करते रहेंगे साथियों ----
[ ••• राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान एक भी मुस्लिम नेता चाहे वह मुस्लिम लीग का जेहादीकरण करने वाला मुहम्मद अली जिन्ना हो, रहमत अली हो, अल्लामा इक़बाल हो, चौधरी खलीकुज्जमा हो ---- किसी के पास भारत विभाजन किए जाने का ठोस सैद्धांतिक विचार उनके लेखों या कृतियों में आपको नहीं मिलेगा।
इन सबमें तथा मुस्लिम लीग के समस्त नेताओं और इस्लामी मौलवियों, मौलानाओं में इस्लामी अहंकार का तर्क छोड़ कुछ नहीं मिलेगा आपको।
चौधरी रहमत अली हो, आगा खान हो, मुहम्मद अली जिन्ना हो, इकबाल हो, इनकी रचनाओं और भाषणों में सिर्फ एक जिद और मुहावरा बार बार मिलेगा जिसे सातवीं सदी से इसलामी मौलानाओं और इसके आक्रांताओं ने स्थापित कर रखा है।
वह जिद यही है कि इस्लाम ही एकमात्र सच है, जिसे दुनिया के ऊपर साम्राज्य कायम करने का खुदाई अधिकार है।
अतः राज तो मुसलमान ही करेंगे,
अभी यदि पूरे हिन्दुस्तान में नहीं तो फिलहाल जितना हिस्सा अलग करके कर सकते हैं।
इसके अलावा पाकिस्तान के लिए कोई तर्क इस्लामी सिद्धांतकारों के पास नहीं था।
नीच और नराधम कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने सच्चाई के एकदम विपरीत "असुरक्षा के तर्क का अतिरिक्त हथियार" इस मुस्लिम जमात को अलग से पकड़ा और रखा है और अनुभवी, धूर्त योद्धा की तरह इसलामी प्रतिनिधियों ने इसे अपने जखीरे में रख भी लिया है।
जरूरत पड़ने पर इस हथियार को वे बखूबी तरीके से अपने परम अज्ञानी हिन्दू शिक्षित वर्ग के नुमाइंदे --- अंग्रेजी पत्रकारों के सामने जमकर प्रयुक्त करते हैं और उनके वक्तव्यों की वैधता लेकर अपना मूलभूत एजेंडा आगे बढ़ाते रहते हैं।
भारत में इस्लामी जनमत के इस देशविरोधी तबके की तरफ से कुतर्क और लंतरानी पेलने का काम अर्हनिश भाव से मार्क्सवादियों ने सदैव जारी रखा है।
यह बात हरेक अध्येता को ठीक से पता होनी चाहिए कि, इतिहास के भीतर इस्लाम ने अपने जन्मकाल के समय से लेकर आज की तारीख के बीच तक कभी अपनी बात को शब्द और तर्क से रखना नहीं सीखा है।
अपने जन्म के समय भी, स्वयं मक्का में ही, छल, धूर्तता और बल के उपयोग से ही स्थानीय लोगों को इस्लाम के झण्डे तले लाया गया था।
विचार और विवेक से लोगों को कायल कर सकने की स्थिति उसमे न तब थी न अब है।
इस्लाम को केवल ताकत की भाषा आती है।
अपनी जन्मभूमि ही नहीं, वहां से दूर देशों में भी उसे केवल तलवार या सत्ता के बल पर ही फैलाया गया।
यह एक सामान्य तथ्य है जिसे इसलामी विद्वान और नेता गर्व से स्वीकार करते रहे हैं।
मुहम्मद गोरी के तुर्क गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा दिल्ली में हिंदू मन्दिर को ध्वस्त करके जो तथाकथित कुतुबमीनार बनाई गई, उसे नाम दिया गया था ---- कुव्वत उल इस्लाम अर्थात इसलाम की ताकत।
तबसे शतियां बीत गई।
इस्लाम का यह मुख्य गुणधर्म यथावत रहा है।
इसीलिए उन्नीसवीं बीसवीं शती में मौलाना हाली और अल्लामा इकबाल जैसे प्रसिद्ध कवि, चिंतक, रचनाकारों ने भी इसलामी तलवार के ही गुण गाए थे।
ताकत के अलावा उसमें किसी गुण का उल्लेख नहीं है।
आज भी एम जे अकबर जैसे प्रतिभावान मुस्लिम लेखक भी तलवार के ही रंग("शेड ऑफ स्वॉर्ड्स" को देखते हैं।
सबसे बडे़ इमाम और आलिम मुख्यत: ताकत और धमकी की ही भाषा बोलते हैं।
इसलाम का यही अंदाज सारी दुनिया में रहा है।
शुरू से लेकर आज तक, हर कहीं ताकत और तलवार की शब्दावली पर बल देना किसी तरह संयोग नहीं है।
न यह कोई प्रतिरक्षात्मक अंदाज है।
इसलाम सदैव ताकत, वह भी आक्रमण की ताकत, की भाषा में बोलता रहा है।
यह चुनी हुई बातें नहीं, पूरा इतिहास है।
पाकिस्तान बनाने की जिद किसी भी तरह का तर्क या विचार विमर्श करके नहीं, बल्कि 1946 के "डायरेक्ट एक्शन" की ताकत और कलकत्ता की सड़कों पर खूनी खेल दिखाकर, भयंकर दहशत पैदा करके पूर्ण की गई थी।
मुसलमान राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में उत्पीड़ित नहीं, बल्कि खुद को मुग़ल शासन के उत्तराधिकारी के तौर पर सदियों से अपने को हिन्दुस्तान का शासक समझते थे।
मुस्लिम लीग और उसके नेताओं का तर्क यही था कि जिन हिंदुओं को अंगूठे के नीचे दबाकर रखा, उनके साथ बराबरी कैसी या उनके बहुमत में बनी सरकार के भीतर कैसे हम रह सकते हैं।
कांग्रेस का तथाकथित राष्ट्रवादी मुस्लिम चेहरा और गांधी नेहरू का दाहिना हाथ तथा भारत का प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद पाकिस्तान बनने से मात्र इसलिए दुखी रहता था क्योंकि उसका बड़ा उद्देश्य था ---- संपूर्ण हिन्दुस्तान का इस्लामीकरण धीरे धीरे करना।
वह इस बात को कहता भी था कि हमारे पूर्वजों ने हिन्दुस्तान में 700 वर्ष राज किया है, इसका एक एक कोना उन्होंने अपने शौर्य और भुजाओं के बल पर विजित किया है, हम हिन्दुस्तान को यूं ही नहीं छोड़ देंगे...!