उन्होंने मानव सभ्यता के आरंभिक समय में ही ऐसे जीवन मूल्यों को स्थापित किया। जो धर्म के आधार बन गये।
इन सब से भी बड़ी बात है। भयानक आपदाओं, असहनीय पीडाओं में जीवन मूल्यों का सम्मान करते रहे।
वह कोई सामान्य परिस्थिति हो या युद्ध हो किसी भी परिस्थिति में जीवन मूल्यों को त्यागा नही जा सकता है।
वेहनसांग अपनी यात्रा वृतांत में लिखता है। यह विचित्र देश है। जंहा युद्ध हो रहा है, उससे थोड़ी ही दूरी पर किसान बिना भय के खेत में बैल चला रहे है। मेगनस्थीज इंडिका में लिखता है। यह ऐसा व्यवस्थित समाज है। जंहा युद्ध मे फसल को नष्ट करना अनैतिक है।
यह राम का देश है।
उनके आदर्शो कि भूमि है।
अभी कुछ क्षण ही पहले उन्हीं का एक महान राज्य के राजा के रूप में राज्याभिषेक था। और अभी वह वनवासी बन गये।
लेकिन वह केवट को गंगा उतराई देने के लिये चिंतित है। उनके चेहरे का भाव ऐसा है। जो बता रहा है इस केवट को कुछ देना चाहिये।
देने के लिये शरीर गेरुआ वस्त्र, तुलसी की माला के अतिरिक्त कुछ नही है। भार्या जनकनन्दिनी उनका वह भाव पढ़ लेती है। अंगुली से मुद्रिका निकालकर देने लगी।
केवट उनके पैरों गिरकर बिलख बिलखकर रोने लगा।
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उनके भाई लक्ष्मण जीवन मृत्यु से लड़ रहे है। इस जंगल, पहाड़, समुद्र के किनारे चिकित्सक मिलना लगभग असंभव है। उनके परमभक्त हनुमान जी, रावण के राजवैद्य को बलात लेते आते हैं।
वह राजवैद्य फिर भी लक्ष्मण कि चिकित्सा के लिये तैयार नही है।
कोई भी ऐसी परिस्थिति में अपना धैर्य खो देगा। उनके पास एक शक्तिशाली सेना है। वह स्वंय ऐसे योद्धा जिनको पराजित नही किया जा सकता है।
लेकिन वह चिकित्सक को उनके चिकित्सक धर्म कि बात करते हैं। एक चिकित्सक के लिये राजा के प्रति निष्ठा महत्वपूर्ण है या रोगी का उपचार महत्वपूर्ण है।
यह सब कुछ उन्होंने इसलिये किया। आने वाला अंनत युग कठिन परिस्थितियों, विपदाओं मे जीवन मूल्यों, धर्म का त्याग न करें। इस सभ्यता में जो कुछ भी सुंदर, सत्य है, वह राम है।
तभी तो 500 वर्ष तक पीढ़ी दर पीढ़ी राममंदिर के लिये संघर्ष करती रही। ऐसा अनवरत संघर्ष, धैर्य मनुष्य के इतिहास में कम ही मिलता है।
राम कि शक्तिशाली भुजाओ और हिमालय से हिंदमहासागर तक फैली उनकी मर्यादा के वटवृक्ष के नीचे हम सभी अपने गुणों, अवगुणों के साथ सुरक्षित आनंदित है।।