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पिता वेदों, उपनिषदों के ज्ञाता के साथ रामभक्त थे। माँ, माता भगवती की पूजा करती थी। इनकी सबसे छोटी संतान होने के कारण बहुत प्यार दुलार मुझे मिला था।
विद्रोह, क्रोध, ज्ञान यह तीनों का सम्मिश्रण थे। वामपंथ ने आकर्षित किया। लाइब्रेरी में मार्क्सवाद पढ़ डाले। यहां तक कि मार्क्स की '#पूँजी\' जैसी पुस्तक नहीं छूटी।
मार्क्सवाद अच्छा है या बुरा है, यह बहस हो सकती है लेकिन यह भारतीय समाज जहां वर्ण व्यवस्था है, उसके लिये तो कदापि नहीं है।
फिर समाज में असमानता है, भेदभाव है। ऐसे समाज का भविष्य क्या है, इसका उत्तर मिल नहीं सका।
एक दिन लाइब्रेरी में एक बहुत छोटी से पुस्तक पड़ी थी। उसके उपर लिखा था 'अग्निमंत्र', मैंने जिज्ञासावस उठा लिया। उसमें लिखा था...'' किसी समाज का निर्माण सदियों में होता है। जिस काल में हुआ था उसके सर्वोत्तम नियमों से हुआ होगा, जैसे आज तुम नियम बनाते हो। कालांतर में समाज और उसकी आवश्यकता बदल जाती है। फिर वह व्यवस्था भी अनुपयोगी हो जाती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह कभी उपयोगी नहीं थी। उसकी आलोचना मत करो, उससे घृणा मत करो।
मेरे बच्चों! समाज एक वृक्ष कि तरह होता है। समय समय पर शाखाएँ सूख जाती हैं। तुम वृक्ष मत काटो, सूख चुकी शाखाओं को हटा दो जिससे नये कपोल आ सकें। तुम्हारा धर्म शताब्दियों का अन्वेषण है। समाज की कुरीतियों को धर्म से मत जोड़ो। समाज को व्यवस्थित करो, धर्म स्वतः खिल उठेगा।"
पलटकर देखा तो यह पुस्तक 19वीं सदी के महान संत #स्वामी_विवेकानंद के वचन थे। फिर तो स्वामी जो को पढ़ते ही गये। मेरे चिंतन, व्यक्तित्व पर स्वामी जी का बहुत प्रभाव है।
यह भारत का सौभाग्य है कि उसकी धरती पर विवेकानंद जैसे ज्ञानी, विद्वान, वक्ता, संन्यासी पैदा हुये थे। यह भूमि धन्य है जो ऐसे महापुरुषों को जन्म देती है।