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जो खोले कलेजा शेरो से भिड़ जाता था।
जिसकी हुंकार से दुश्मन भी थर्राता था।
महाराजा खेमकरण ने औरंगजेब के भरे दरबार में निहत्थे ही नरबक्षी शेर को मार गिराया था। इनके इसी पराक्रम से भयभीत होकर मुगलों ने इन्हे "फौजदार" की उपाधि दी। इन्होंने विधर्मियों से बहन-बेटियों के सतीत्व की रक्षा की तथा अपने अधीन ब्रज क्षेत्र में उन्होंने जजिया कर नहीं लगने दिया, जबकि यह संपूर्ण भारतवर्ष में लागू रहा। खेमकरण चक्राकार तलवार चलाने में प्रवीण थे। इन्होंने अपनी तलवार से सभी को लोहा मानने को विवश किया।
सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में उत्तर भारत के राजनैतिक परिदृश्य में क्रांतिकारी भूमिका निभाने वाले अप्रितम योद्धा खेमकरण सोगरिया ने स्वतंत्रता, धर्म-संस्कृति तथा मानवता की रक्षा के लिए मुगल सल्तनत से लंबा संघर्ष किया। इन्होंने सम्राट आलमगीर से सशस्त्र संघर्ष , सम्राट जहांदार शाह से सामूगढ़ युद्ध, थूनगढ़ी की रक्षार्थ युद्ध, ब्रज क्षेत्र में स्वतंत्र राज्य स्थापना के लिए आजीवन संघर्ष किया।
ऐसे अदम्य साहस और वीरता के प्रतीक महाराजा खेमकरण सोगरिया जी की जन्म जयंती पर उन्हें सादर नमन एवम विनम्र श्रद्धांजलि।

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