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वास्तव में मोहनदास करमचंद गांधी उर्फ महात्मा गांधी निजारी इस्माईली सुन्नी मुसलमान था (गूगल से भी ये पता लगता है कि गांधी निजारी इस्माईली सुन्नी मुसलमान होते हैं) जिसे फर्जी नेहरू और फर्जी गांधी खानदान ने हिन्दुओं को गुमराह करने हेतु छिपाया था और हिन्दू लोग आजतक गुमराह ही हैं।

30 जनवरी सन् 1948 ई० को गांधी की हत्या हुई 31 जनवरी सन् 1948 ई० दिल्ली में यमुना नदी पर दाहसंस्कार किया गया था परन्तु अस्थिओं का विसर्जन नहीं हुआ। कांग्रेसियों ने उन अस्थिओं को रामपुर के शासक नबाब रजा अली खां को सौंप दिया। रजा अली उन अस्थिओं को 11 फरवरी सन् 1948 ई० को स्पेशल ट्रेन से रामपुर ले गया। अस्थियों को गंगा में विसर्जित करने के बजाय मुस्लिम तरीके से चांदी की सुराही में भरकर मुस्लिम तरीके से दफन कर मजार बना दी और तीन दिन का राजकीय शोक घोषित कर दिया था। क्योंकि उस समय तक रामपुर रियासत का विलय भारत में नहीं हुआ था। सालों बाद उसे गांधी स्मारक घोषित कर दिया। आजादी के बाद 30 जून सन् 1949 ई० को रामपुर रियासत सरदार वल्लभभाई पटेल जी के सख्ती के कारण भारत में विलय हो गया था।

कांग्रेसियों ने देश से छिपाई गांधी की असलियत राजघाट दिल्ली में जो बना है वह है गांधी स्मारक और रामपुर (उत्तर प्रदेश) में जो बना है वह है गांधी की मजार (कब्र)। बापू की अस्थियों को लेकर बहस छिड़ी थी कि गांधी हिंदू हैं इसलिए उनकी अस्थियों का विसर्जन भी हिंदू ही करेंगे। परन्तु कांग्रेसियों और रामपुर के नबाब रजा अली खां जानते थे कि मोहनदास करमचंद गांधी उर्फ महात्मा गांधी निजारी इस्माईली मुसलमान हैं अत: दिल्ली में रामपुर के नवाब रजा अली और दरबारी कांग्रेसियों की मिटिंग हुई जिसमें निर्णय हुआ कि बापू की अस्थियां नवाब रजा अली खान को दे दी जायें। नवाब रजा अली गांधी परिवार से अस्थियाँ स्पेशल ट्रेन से रामपुर ले गया और अस्थियों को चांदी की सुराही में भरकर मुस्लिम तरीके से दफनाकर गांधी की मजार बना दी

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