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मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीरामचन्द्र जी का सम्पूर्ण जीवन अलौकिक, मर्यादित है। कुछ कहने के लिये सर्वथा अयोग्य है।
उनके सभी भाई उनसे अतिशय प्रेम करते हैं। लेकिन वह श्रेष्ठ भ्राता के रूप में कैसे हैं !
उनकी परछाईं बनकर रहने वाले लक्ष्मण जी। क्रोधी भी है, बिना कुछ सोचे समझें निर्णय लेते रहते हैं।
महाराज दशरथ अपने वचन को वापस नही लेते है। वह कैकेयी से अनुनय विनय करते हैं। वह वनवास का वर न ले। लेकिन कैकेयी अडिग है।
लक्ष्मण जी इतने क्रोध में है कि महाराज दशरथ को बंदी बना लेने कि सलाह देते है। वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि वह दशरथ को युद्ध के लिये ललकारते है।
पिता के प्रति भगवान राम कि असीम श्रद्धा है। वह लक्ष्मण जी ऐसा कुछ भी न करने के लिये कहते हैं। भगवान कि बिल्कुल भी इच्छा नही थी। कि लक्ष्मण जी साथ चले, लेकिन लक्ष्मण जी का जो स्वभाव है। उनको साथ ले जाना पड़ा।
भगवान भरत जी जब चित्रकूट मर्यादापुरुषोत्तम राम से जब मिलने आते हैं। तो लक्ष्मण जी कहते है भरत को लोभ हो गया है। वह सेना के साथ आ रहे है। यहां भी युद्ध के लिये तैयार हो जाते हैं।
भगवान रामभद्र बहुत भावुक होकर कहते हैं । लक्ष्मण स्वर्ग के देवता इंद्र को भी लोभ हो सकता है। यह पृथ्वी अपना धैर्य खो सकती हैं। गंगा जी अपनी पवित्रता त्याग सकती है। लेकिन भरत को कभी भी लोभ नही हो सकता है।
जब इन्हीं शेषावतार लक्ष्मण जी को शक्ति आघात करती है। वह मूर्क्षित हो गये। जीवन मृत्यु से लड़ रहे थे। तो भगवान रामभद्र इस तरह से बिलख बिलख कर रो रहे थे। चराचर जगत दुखी हो गया। ऐसे उलाहना दे रहे थे, जैसे उन्हीं के कारण ही उन्हें मूर्च्छा लगी हो।
मैं उर्मिला से क्या कहूँगा,
मैं माता सुमित्रा से क्या कहूँगा,
यह संसार यही कहेगा कि राम ने पत्नी के लिये भाई का जीवन खतरे में डाल दिया।
उनके विलाप को देखकर योगीयों के महायोगी देवो के महादेव भी द्रवित हो गये।
बड़े भ्राता के रूप में भगवान रामभद्र लक्ष्मण जी के स्वभाव को समझतें है। उनकी समस्त स्वभावजनित कमियों के लिये क्षमा करते रहतें है। इन सब के साथ उनका स्नेह लक्ष्मण जी के लिये बना हुआ है।।