"जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्ते"
"Jambudvipe Bharatvarshe Bharatkhande Aryavarte"
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"सुमेर से यरूशलेम तक: निषिद्ध परिकल्पना" जॉन सैसून ने लिखा है । यह आँख खोल देने वाली पुस्तक है। इन्होनें लिखा है कि, सुमेर की सभ्यता का भारत और यहूदी से निकट का संबंध है। फ़िर सुमेर और आइंस्टीन का निकट संबंध है। अल्बर्ट आइंस्टीन, श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ते थे। इन्होनें लिखा है कि, भगवान ने इस ब्रह्मांड को कैसे बनाया तो बाकी सब कुछ बहुत ही अनावश्यक लगती है । आइंस्टीन ने भगवान को विज्ञान से जोड़ते हुए लिखा कि परब्रह्म भगवान, वे रहस्यमय शक्ति है, जो मूल विज्ञान की भी शक्ति है। अणु और परमाणु में भगवान के विराट स्वरूप को आइंस्टीन ने देखा। आइंस्टीन, यहूदी थे, जो सुमेर सभ्यता के मुख्य घटक थे। इसलीये आइंस्टीन सनातन संस्कृति के बहुत निकट थे। भारत की प्राचीन परिभाषा मिलती है: "जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्ते " इस भारतवर्ष परिभाषा में : पारस (ईरान), अफगानिस्तान, पाकिस्तान,नेपाल, तिब्बत, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, मालद्वीप, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, कम्बोडिया, वियतनाम, लाओस तक भारतवर्ष है। इस भारतवर्ष परिभाषा में विशाल भारत खंड में सुमेरु शामिल है । रामायण काल तक में वर्तमान भारत और सुमेरु एक हैं। वाल्मीकि रामायण में वर्णन इस प्रकार है-
'तमतिक्रम्य शैलैंद्रमुत्तर: पयसां निधि:, तत्र सोमगिरिर्नाम मध्येहमेमयो महान्।
स तु देशो विसूर्योपि तस्य भासा प्रकाशते, सूर्यलक्ष्याभिविज्ञेयस्तपतेव विवस्वता' ।।
इसलिए सुमेर के मित्तानि में वैदिक देवताओं के नाम मिलते हैं। यह सहज संबंध कोई एक दो दिनों की नहीं है। महाभारत युद्ध के समय कुरुक्षेत्र के समर युद्ध में भारत और सुमेर ने एक साथ युद्ध लड़ा है। भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति में हम रामायण और महाभारत को हटाते हैं तो भारत में एक विशाल शून्यता पाते हैं। जिसका उत्तर उनके पास नहीं है, जो भारत वर्ष को संकुचित दृष्टि से देखते हैं । कम से कम थापर जैसा, उन मूर्ख लोगों के पास तो नहीं जो "ब्राह्मण" और "संस्कृत" को विदेशी मानते हैं।