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रक्तचाप को ठीक करने के लिए तर्जनी, मध्यमा और अंगुष्ठ व्यान मुद्रा के द्वारा हर व्यक्ति को भोजन करना चाहिए

इसी प्रकार किसी व्यक्ति की आँखे खड़ी जो जाएं अर्थात आँखों की घूमने की और चलने की स्थिति समाप्त हो जाए अर्थात आँखें सीधी या टेड़ी होकर स्थिर हो जाएं तो अनामिका, कनिष्ठका और अंगुष्ठ आदि तीनों अंगुलियों के रगड़ने से अर्थात प्राण मुद्रा करने से आँखें पुनः ठीक प्रकार से संचालित होने लगेगी। प्राण मुद्रा के अभ्यास के द्वारा आँखों के कई प्रकार रोग दूर किए जा सकते है। नेत्र ज्योति का विकास संभव हो जाता है।

रोग को दूर करने के लिए जिन विभिन्न मुद्राओं का प्रयोग किया जाता है वे भी रोगी अपनी सुविधा के अनुसार लेटकर बैठकर अथवा अन्य किसी भी स्थिति में सुविधा के अनुसार कर सकता है। अधिकांश मुद्राओं को 45 मिनट अवश्य करना चाहिए किन्तु रोग आदि को दूर करने के लिए जो मुद्राएं प्रयोग की जाती हैं उन्हें अधिक से अधिक किया जा सकता है। किन्तु जब रोग दूर हो जाए तब उनका प्रयोग बन्द कर दिया जाए किन्तु जो मुद्राए शरीर की शक्ति को बढ़ाती हैं व शरीर को शुद्ध करती हैं अथवा बुद्धि का विकास करती हैं व स्नायुमंडल को शक्तिशाली बनाती हैं, उनका प्रयोग अपनी इच्छा अनुसार रोगी व साधक कर सकता है। रोग दूर करने वाली मुद्राओं को रोगी तब तक बार-बार कर सकता है, जब तक की रोग दूर ना हो जाए।

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