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जातिभेद मिथ्या है :

भक्त रैदास कहते हैं कि सभी का प्रभु एक है तो यह जातिभेद जन्म से क्यों आ गया? यह मिथ्या है।

जांति एक जामें एकहि चिन्हा, देह अवयव कोई नहीं भिन्ना।
कर्म प्रधान ऋषि-मुनि गावें, यथा कर्म फल तैसहि पावें।
जीव कै जाति बरन कुल नाहीं, जाति भेद है जग मूरखाईं।
नीति-स्मृति-शास्त्र सब गावें, जाति भेद शठ मूढ़ बतावें।

अर्थात् 'जीव की कोई जाति नहीं होती, न वर्ण, न कुल। ऋषि-मुनियों ने वर्ण को कर्म प्रधान बताया है, हमारे शास्त्र भी यही कहते हैं। जाति भेद की बात, मूढ़ और शठ करते हैं। वास्तव में सबकी जाति एक ही है।' संत रविदास कहते हैं कि संतों के मन में तो सभी के हित की बात ही रहती है।

वे सभी के अन्दर एक ही ईश्वर के दर्शन करते हैं तथा जाति-पाँति का विचार नहीं करते।

संतन के मन होत है, सब के हित की बात।
घट-घट देखें अलख को, पूछे जात न पात ।।

संत रैदास ने जातिगत भेदभाव की व्यवस्था को अपनी वाणियों में ही सहज ढंग से व्यक्त किया और लोगों को समझाया कि जन्मना कोई श्रेष्ठ या नीच नहीं होता । ओछे (छोटे) कर्म ही व्यक्ति को नीच बनाते हैं।

रविदास जन्म के कारनै, होत न कोऊ नीच।
नर को नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच॥

उनके विचार से जन्मना कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र नहीं है। ऊँची जाति का व्यक्ति वही है, जिसके कर्म अच्छे हैं।

ब्राह्मन् खत्तरी वैस सूद, रविदास जनम ते नाहिं।
जौ चाहइ सुबरन कउ, पावइ करमन माहिं।

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