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2010-2011 में साउथ ब्लॉक अपने क्षेत्र में व्यस्त था और अपने क्षेत्र के बॉक्स ऑफिस को फोड़कर पैसे बटोरने में लगा हुआ था। हालाँकि उत्तर में गोल्डी माईन्स हिन्दी डबिंग से दर्शकों का रुख बदलने लगा था तो वही बॉलिवुडिया फिल्म मेकर्स साउथ ब्लॉक की अच्छी फिल्मों को रिमेक करके बर्बाद करने पर तुले हुए थे।
एसएस राजमौली धीरे-धीरे अपनी सीमाओं से बाहर निकलने की कोशिश में लगे थे लेकिन रीजनल स्तर पर बिग बजट निकालना बड़ी बात थी। परंतु राजमौली को अपने अमरेन्द्र बाहुबली पर पूर्ण विश्वास था और निर्माताओं से मिलने जाते तो बाहुबली को साथ ले जाते। निर्माताओं को राज्य लेवल पर तो पूरा भरोसा था लेकिन पैन भारत में दर्शकों से बाहुबली को स्वीकार्यता मिलेगी या नहीं, थोड़ा असमंजस था लेकिन राजमौली ने निर्माताओं से कहा, आप निश्चिंत रहें, अमरेन्द्र बाहुबली महेष्मति की राजधानी मुंबई को बनायेंगे और पैन भारत बॉक्स ऑफिस को जीतकर लौटेंगे। कट्टपा के सानिध्य में अमरेन्द्र ने रण और नीति कौशल अच्छे से सीखा है सामने कोई नहीं टिकेगा।
ऐसे बाहुबली भारत जीतने निकला और शुरुआत में ही बॉलीवुड में खड़े होकर महेष्मती का ध्वज गाड़ दिया और बोले अभी तो आरंभ है प्रचंड तो बाकी है। क्योंकि अमरेन्द्र तो निकले ही नहीं थे महेंद्र ने सेना की अगुवाई की। इससे बॉलीवुड सहम गया और हतप्रभ था। पैन भारत दर्शकों के प्रेम ने बाहुबली को रुला दिया।
बहुतेरे तुर्रम का किला हिल गया कि ये कैसी दहाड़ है और इसमें न कोई ख़ान है न कपूर, फिर भी इतनी तगड़ी हुंकार भरी है। कुछ ट्रेड पंडित इसे तुक्का मान रहे थे लेकिन भारत में जो लहर बनी थी, ‘कट्टपा ने बाहुबली को क्यों मारा?’
कब अंडर करंट बन गई, सब बेखबर थे लेकिन 2017 में बॉक्स ऑफिस की हालत देखकर रोंगटे खड़े हो चले।
राजमौली अपने बाहुबली के साथ सदैव भारतीय सिनेमा को नया स्वरूप देने के लिए इतिहास में पढ़े जाएँगे। इनके नक्शे कदम पर प्रशांत नील, नाग अश्विन आगे आये है और रिस्क ले रहे है।
जानते जब सिनेमाई पटल पर अमरेन्द्र बाहुबली महेष्मति के युवराज बनने जा रहे थे। इधर भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति का बाहुबली बनने निकलने की तैयारी में जुटे थे और यहाँ भी राजनीतिक पंडित पैन भारत को जीतकर राजधानी दिल्ली में बैठना मुश्किल या कहे नामुमकिन डगर करार दे रहे थे। कई आँकड़े विश्लेषण में तैर रहे थे। फलाना भोट नहीं मिलेगा, ठिमका वोट नहीं कन्वर्ट होगा। क्योंकि नरेंद्र के आगे न गांधी न नेहरू तो सवाल ही पैदा नहीं होता, सूबे की राजनीति को सीमित बतलाया जा रहा था जबकि पैन भारत में जातिगत राजनीति और मोदी की छवि को विलन बताया जा रहा था।
रील का बाहुबली 2015 में आया, जबकि रियल बाहुबली 2014 में सभी पंडितों को बेहोश करके 10 जनपथ को हैरान करके ग़ैर-कांग्रेसी सरकार के साथ पूर्ण बहुमत लेकर राष्ट्रपति भवन पहुँचा और कहा हम गुजरात छोड़कर दिल्ली आ गये है।
तब दरबारी पंडित इसे तुक्का समझकर आँकलन करने लगे, लेकिन यहाँ भी वही बात भई अभी तो शुरू भी नहीं किया है। आगे आगे देखते जाओ।
2019 में कई राजनीतिक पंडित हार्ट अटैक से बचें और मुँह पर पट्टी बांध ली। अब कुछ एनालिसिस नहीं करेंगे।
नरेंद्र बाहुबली के नेतृत्व में नये भारत की नींव रखी जा रही है इसमें भारत के मुकुट पर आर्टिकल-370 का दाग नहीं है और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम टेंट में न होकर भव्य राम मंदिर में विराजमान है। काशी में नंदी महाराज भी महादेव के लौटने की तैयारियाँ करने लगे है।
बदलते भारत में भारतीय राजनीति के जितने भी पुराने आयाम थे सब ध्वस्त पड़े है और नये नये कीर्तितमान लिखे जा रहे है। सभी जातिगत बेरियर टूट चुके है।
नरेंद्र बाहुबली तीसरी बार भारत जीतने निकल पड़ा है और इस बार लक्ष्य बड़ा है। किंतु तैयारी उससे भी बड़ी कर रखी है।
जिस प्रकार राजमौली अमरेन्द्र बाहुबली के साथ रीजनल सिनेमा से पैन भारत में लोकप्रिय हो चले बल्कि अब उससे भी आगे निकल चुके है। सिनेमा में परिवर्तन की बयार ले आये है ठीक उसी तरह नरेंद्र मोदी भी राजनीति में बाहुबली हो चले है। कई तथाकथित चाणक्य तो समझ न पा रहे है कि कुछ दिनों पहले हमारे पास अपना राजनीतिक दल थी आज बेदल हो चले हैं।
राजा संन्यासी हो, तिस पर राष्ट्र प्रेमी हो तब उसे जनता बाहुबली प्रेम लुटाती है। फिर चाहे कितने ही भलालदेव इकट्ठे हो जाये।

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