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बिंदुसार
Bindusara
यूनानी लेखों के अनुसार बिन्दुसार को अमित्रकेटे भी कहा जाता था।
विद्वानों के अनुसार अमित्रकेटे का संस्कृत रूप है अमित्रघात या अमित्रखाद (शत्रुओं का नाश करने वाला)माना जाता है।
बिन्दुसार मौर्य 297-98 ईसा पूर्व में शासक बना और उसने 272 ई.पू. तक राजकाज किया।
बिन्दुसार ने अपने पिता द्वारा जीते गए क्षेत्रों को पूर्ण रूप से अक्षुण्ण रखा था।
बिन्दुसार तिब्बती लामा तारनाथ तथा जैन अनुश्रुति के अनुसार चाणक्य बिन्दुसार के भी मंत्री रहे थे।
कहते हैं कि चाणक्य ने 16 राज्य के राजाओं और सामंतों का पतन करके बिन्दुसार को पूर्वी समुद्र से पश्चिमी समुद्र पर्यन्त भू-भाग का अधिपति बना दिया था।
तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के अनुसार बिंदुसार ने न केवल मौर्य साम्राज्य को अक्षुण्ण रखा अपितु अपने अल्पकालिक जीवन में सम्पूर्ण भारत की एकता कायम रखी।
सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य अंत समय में अन्न जल त्यागकर आत्मार्पण की प्रक्रिया अपना रहे थे,उन्होंने जैन भिक्षुओं का सानिध्य भी प्राप्त किया था और इस तरह वो अपने शासनकाल के कुछ वर्षों बाद शांति की खोज में निकल पड़े।
जिसके बाद सत्ता का नेतृत्व तब 22 वर्ष के रहे बिंदुसार को दे दिया गया जिन्होंने विशाल मगध
साम्राज्य की रक्षा की।
तब भी चाणक्य ही बिंदुसार के प्रधानमंत्री थे।
वह बिंदुसार का ही शासनकाल था जब अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी तक मगध साम्राज्य का फैलाव हो चुका था।
Egypt से लेकर ग्रीस तक इस साम्राज्य के प्रगाढ़ संबंध रहे।
इतिहास में बिन्दुसार को “महान पिता का पुत्र और महान पुत्र का पिता” की उपाधि दी गयी हैं। क्योंकि वह महान पिता के पुत्र थे और महान पुत्र के पिता।

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