1544 ई. में अफगान बादशाह शेरशाह सूरी और मारवाड़ के राव मालदेव राठौड़ के बीच गिरी सुमेल की लड़ाई हुई।
इस लड़ाई से पहले शेरशाह ने कूटनीति से राव मालदेव और उनके सामंतों के बीच अविश्वास पैदा कर दिया, जिससे राव मालदेव ने अपनी फौज पीछे हटाने का आदेश दिया।
जब इस षड्यंत्र का पता वीर योद्धा कूंपा जी को लगा, तो उन्होंने राव जी को समझाने का प्रयास किया, फिर भी राव जी न माने।
तब कूंपा जी ने कहा कि "सच्चे राजपूतों में ऐसा विश्वासघात पहले तो कभी न हुआ। मैं राजपूतों की प्रतिष्ठा पर लगाए गए इस कलंक को अपने रक्त से धोऊंगा या शेरशाह को अपने थोड़े से सिपाहियों के साथ पराजित करूँगा"
फिर 8-9 हजार राठौड़ों ने शेरशाह की 80 हजार की फौज पर ऐसा पुरज़ोर आक्रमण किया, कि लड़ाई के बाद शेरशाह सूरी को भी कहना पड़ा कि "मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैं हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता"
पोस्ट लेखक :- तनवीर सिंह सारंगदेवोत

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