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यदि कोई संत , दार्शनिक मर्यादापुरुषोत्तम भगवान राम के चरित कि भी आलोचना करता है। तो उसका उद्देश्य बहुत गहरा है।
वह चाहते हैं कि राम के प्रति आपकी श्रद्धा गहनतम से गहनतम होनी चाहिये। यदि उनके चरित पर ही रुक गये तो परमात्मा का दर्शन कैसे होगा।
उनका चरित रोमांचित, भावविव्हल कर देता है। लेकिन इससे राम का वह परमात्मा स्वरूप कहीं खो जाता है। उसी परमात्मा को आप समझ सकें कई संतो ने चरित को महत्वहीन किया है।
यदि उनके चरित पर आघात, आपकी श्रद्धा, आस्था को विचलित कर दे रहा है। तो संतो आघात ठीक है। आपकी श्रद्धा मे शुद्धता, समर्पण नही है।