2 jr - Vertalen

अदाता वंश दोषेन कर्मदोषाद्रिद्रता |
उन्मादो मातृदोषेण पितृदोषेण मूर्खता ||
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अर्थात- वंशानुगत दोष के कारण कोई भी व्यक्ति कृपण (कंजूस) होता है और बुरे कर्मों के कारण दरिद्र होता है | मातृदोष के कारण
व्यक्ति उन्मादी और पितृदोष के कारण मूर्ख होता है |

जिस व्यक्ति के वंश (कुल) में धर्मानुसार आचरण ना किया जाता रहा हो या दूसरों के धन का अवांछित तरीकों से हरण किया जाता रहा हो वह व्यक्ति स्वभावतः दानपुण्य, तीर्थाटन आदि सत्कर्मों में धन व्यय करने का इच्छुक नहीं होता। जबकि दरिद्रता मनुष्य के अपने बुरे कर्मों या आलस्य का फल होती है (क्योंकि उद्यमी व्यक्ति परिश्रम करके दरिद्रता को दूर कर सकता है पर दोषपूर्ण कर्मों वाला व्यक्ति दरिद्रता को दूर करने योग्य कर्म कर ही नहीं सकता)। इसी प्रकार जिसकी माता धर्मानुकूल आचरण, व्रत, पुण्यादि करनेवाली ना रही हो वह संतान उन्मादी (अविवेकी, निर्णय लेने में असमर्थ, सनकी, विक्षिप्त आदि) होती है व जिसके पिता का जीवन अधर्मयुक्त कार्यों में निरत रहा हो वह संतान मूर्ख होती है। इस प्रकार पूर्वजों व मातापिता के सत्कर्म ही वंशजों का भविष्य निर्धारित करते हैं।

चित्र- मंदिर में मातापिता के साथ आई इस छोटी बच्ची को देखकर याद आया ऊपर लिखा श्लोक। सुबह सुबह नहाधोकर स्वच्छ वस्त्र पहनकर सजधजकर बालों में पारंपरिक वेणी लगाकर आई हुई इस बिटिया को देखकर कितनी सारी अच्छी बातें सुनिश्चित हो रही हैं। बच्चों को प्रातः जल्दी जागना चाहिए। समय से नहाना चाहिए। स्वच्छ सुंदर वस्त्र पहनने चाहिए और सपरिवार मंदिर जाकर भगवान जी की पूजा करनी चाहिए। इन छोटीछोटी बातों में इस परिवार के कितने सुख, कितना कल्याण छिपा हुआ है,कहने की बात नहीं है।

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