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फिल्म का सबसे शानदार सीन कौन सा है।
जो आपको अंदर तक हिला देगा
हफ्तों तक आपको याद रहेगा।
यह काला पानी के अमानवीय अत्याचार वाला सीन नहीं है
वो तो आपको पता ही है काला पानी में किस हद तक प्रताड़ित किया जाता था। यह वो सीन भी नहीं है जब वर्षों बाद पका हुआ भोजन देखकर सावरकर भावुक हो जाते हैं। या जब वर्षों बाद वो पहली बार पैन पकड़ते हैं।
वो सीन है जब सावरकर 14 साल की जेल के बाद रत्नागिरी जेल से पहली बार बाहर निकलते हैं।
वो सीन आपको अंदर तक तोड़ देता है
जब वो जेल से बाहर निकल रहे होते हैं तब पीछे से भीड़, ढोल और सावरकर जिंदाबाद की नारे सुनाई दे रहे होते हैं ऐसा लगता है कि जेल के उस पार सैकडों लोग इस क्रांतिकारी के छूटने का इंतजार कर रहे होंगे।
लेकिन जब जेल का गेट का खुलता है
बाहर एक आदमी नहीं होता
एक भी नहीं
सिर्फ उनके बड़े बाई उन्हें जेल से लेने के लिए आए होते हैं
और कोई नहीं होता
उस सीन को देखकर महसूस होता है
पानीपत में खड़े सदाशिवराव भाऊ भी अकेले थे
1857 में अंग्रेजों से लड़ते तात्या टोपे भी अकेले थे
और 14 साल की जेल काटकर बाहर निकले सावरकर भी अकेले ही हैं
जब इनके बेटे की मृत्यु हो जाती है और मराठी भाषा में सागरा प्राण तडमडला कविता का वाचन होता हैं!
यह समाज ही ऐसा है
जो अपना सबकुछ इसके लिए दांव पर लगाता है
समाज उसे ही अकेला छोड़ देता है
इसलिए संघ सामूहिकता पर चलता है
जो कराना है पूरे समाज को खड़ा करके सारे समाज से कराना है
ताकि फिर कोई सावरकर परिवार की तरह
सब कुछ लुटाकर भी
अकेले, निसाह न रह जाए।
सावरकर को समझना सामान्य व्यक्ति के औकात से बाहर है,
अटल जी के शब्दों में
सावरकर माने तेज
सावरकर माने तलवार
सावरकर माने तारून्य,
सावरकर माने तप, त्याग .........जितने शब्दकोष है जेहन में लिखते जाओ का मिश्रण है वीर सावरकर
जय हिन्दुस्थान ।।

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