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हजारों वर्ग किलोमीटर भूमि, अथाह भौतिक संपत्ति और अमोल ऐतिहासिक विरासत को खोने की पीड़ा झेलकर भी हिन्दुओं ने इस सोच के साथ खुद से समझौता कर लिया कि कम से कम अपने बचे भू भाग में अपने सपनों का देश बनायेंगे, इसे सच्चे अर्थों में आर्यभूमि बनाएंगे, इसे रामराज्य बनायेंगे।

परन्तु गांधी नेहरू की जोड़ी ने दुहाई दे देकर हिंदुओं की भावना से ब्लैकमेल कर मुस्लिमों को भारत में ही रोक लिया।

जो आज जनसंख्या जिहाद के द्वारा भारत में वहाबी मुसलमानों को अल्पसंख्यक से बहुसंख्यक में परिवर्तित कर गैर मुस्लिम राष्ट्र (दारूल हरब/युद्ध का मैदान) को इस्लामी राष्ट्र (दारूल इस्लाम/शान्तिमय भूमि) में परिवर्तित करने पर ही स्थाई शान्ति महसूस करते हैं।

जिस मुस्लिम पहचान के कारण 1947 में भारत का बंटवारा पाकिस्तान के रूप में हुआ था। वह प्रश्न आज ज्यों का त्यों है।

बंग्लादेश देश के जहांगीर खां ने "बंग्लादेश, पाकिस्तान, काश्मीर तथा पश्चिमी बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, व हरियाणा के कुछ मुस्लिम बहुल भागों को मिलाकर मुगलिस्तान नामक इस्लामी राष्ट्र बनाने का सपना संजोया है।" (मुसलमान रिसर्च इंस्टीट्यूट, जहांगीर नगर, बंग्लादेश, 200

इस योजना को क्रियान्वित करने के लिए सुनियोजित बद्ध तरीक़े से बड़े पैमाने पर बंग्लादेशी मुसलमान घुसपैठियों की इन क्षेत्रों मे घुसपैठ कराई गई है और अब इसमें रोहिंग्या मुसलमानों को भी जोडा लिया गया है। इसके अतिरिक्त वहाबी मुसलमान और सेक्युलर हिन्दू इस कार्य में हर सम्भव मदद/सहयोग कर रहे हैं।

जिसका परिणाम पहले कश्मीर और आज बंगाल, असम, केरल, कैराना में स्पष्ट दिखाई दे रहा है। यह छुट पुट रूप से सभी स्थानों मे निर्बाधरूप से जारी है। जिसकी नियति हिन्दुओं का पलायन है, पहले पश्चिमी व पूर्वी पाकिस्तान और उसके बाद काश्मीर।

बाल्यकाल से ही बच्चों को कुरान और हदीसें की वें आयतें पढाई जाती हैं, जिनसे आतकवाद पनपता है और साथ साथ मुस्लिम और गैर मुस्लिमों के बीच एकता व मित्रता की आज्ञा नहीं देती हैं और स्थाई नफरत पैदा करती हैं।

इस विषय को और अधिक सुस्पष्ट करते हुए इतिहासकार डाॅ के एस लाल (1920-2002) अपनी पुस्तक 'थ्योरी एण्ड प्रेक्टिस आफ मुस्लिम स्टेट इन इंडिया' के पृष्ठ 5 लिखते हैं, "कुरान की 6326 आयतों में से 3900 आयतें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से अल्लाह और उसके 'रसूल' (मुहम्मद) में ईमान न रखने वालों या काफिरों, मुशरिकों (बहुदेववादियों) मुनकिरों व मुनाफिकों (कपटाचारियों) से संबंधित हैं। मुख्य रूप से ये 3900 आयतें दो श्रेणी की हैं। एक श्रेणी की आयतें उन मुसलमानों से संबंधित हैं, जो अल्लाह में ईमान लाने के कारण इसी जीवन में और मरने के बाद भी पुरस्कृत किये जाऐंगे और दूसरी प्रकार की वे आयतें हैं, जो गैर ईमान वालों व काफिरों से संबंधित हैं, जो कि न केवल इस जीवन में सताए जाऐंगे बल्कि मरने के बाद जहन्नुम (एक प्रकार कि नरक) की आग में डाले जायेंगे।"

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