🙏🙏जय सियाराम जी🙏🙏
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अब अति कीन्हेहु भरत भल
तुम्हहि उचित मत एहु।
सकल सुमंगल मूल जग
रघुबर चरन सनेहु॥
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भावार्थ:-मुनिश्रेष्ठ भारद्वाज जी कहते हैं कि हे भरत! अब तो तुमने बहुत ही अच्छा किया, यही मत तुम्हारे लिए उचित था। श्री रामचन्द्रजी के चरणों में प्रेम होना ही संसार में समस्त सुंदर मंगलों का मूल है।
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सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना।
भूरिभाग को तुम्हहि समाना॥
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यह तुम्हार आचरजु न ताता।
दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता॥
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भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी के चरणों का प्रेम तो तुम्हारा धन, जीवन और प्राण ही है, तुम्हारे समान बड़भागी कौन है? हे तात! तुम्हारे लिए यह आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि तुम दशरथजी के पुत्र और श्री रामचन्द्रजी के प्यारे भाई हो।
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सुनहु भरत रघुबर मन माहीं।
पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं॥
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लखन राम सीतहि अति प्रीती।
निसि सब तुम्हहि सराहत बीती॥
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भावार्थ:-हे भरत! सुनो, श्री रामचन्द्र के मन में तुम्हारे समान प्रेम पात्र दूसरा कोई नहीं है। लक्ष्मणजी, श्री रामजी और सीताजी तीनों की सारी रात उस दिन अत्यन्त प्रेम के साथ तुम्हारी सराहना करते ही बीती।
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वंदउ राम लखन वैदेही।
जे तुलसी के परम् सनेही॥
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अनुज जानकी सहित निरंतर।
बसउ राम नृप मम उर अंतर॥
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🙏🙏जय सियाराम जी🙏🙏

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