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🌹 🌷 ।। श्री ।। 🌷 🌹
जय सियाराम सुमंगल सुप्रभात प्रणाम बन्धु मित्रों। राम राम जी।
श्रीरामचरितमानस नित्य पाठ पोस्ट ३५७, बालकाण्ड दोहा ७५/१-४, शिवजी कि विरह अवस्था।
कतहुॅं मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना।
कतहुॅं राम गुन करहिं बखाना।।
जदपि अकाम तदपि भगवाना।
भगत बिरह दुख दुखित सुजाना।।
एहि बिधि गयउ काल बहु बीती।
नित नै होइ राम पद प्रीती।
नेमु प्रेमु संकर कर देखा।
अबिचल हृदयॅं भगति कै रेखा।।
भावार्थ:- शिवजी सति के विरह में कहीं मुनियों को ज्ञान का उपदेश करते और कहिं श्रीरामचन्द्र जी के गुणों का वर्णन करते थे। यद्धपि सुजान शिवजी निष्काम है, तो भी वे सती के वियोग से दुःख से दुःखी है। इस तरह बहुत समय बीत गया। श्रीरामचन्द्र जी के चरणों में नित नयी प्रीति हो रही है। शिवजी के कठोर नियम, प्रेम और उनके हृदय में अटल भक्ति को श्रीरामचन्द्र जी ने देखा।
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