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🌹 🌷 ।। श्री ।। 🌷 🌹
जय सियाराम सुमंगल सुप्रभात प्रणाम बन्धु मित्रों। राम राम जी।
श्रीरामचरितमानस नित्य पाठ पोस्ट ४५८, बालकाण्ड दोहा १०४/१-४, याज्ञवल्क्य जी ने भरद्वाज से आगे कहा।
मैं जाना तुम्हार गुन सीला।
कहउॅं सुनहु अब रघुपति लीला।।
सुनु मुनि आजु समागम तोरें।— at Hyderabad Chappal Bazar Kachiguda.
कहि न जाइ जस सुख मन मोरें।।
राम चरित अति अमित मुनीसा।
कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा।।
तदपि जथाश्रुत कहउॅं बखानी।
सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी।।
भावार्थ:- याज्ञवल्क्य जी भरद्वाज से कह रहे हैं, मैंने तुम्हारा गुण और शील जान लिया। अब मैं श्री रघुनाथ जी की लीला कहता हूं, सुनो। हे मुनि! सुनो आज तुम्हारे मिलने से जो मेरे मन में जो आनंद हुआ है, वह कहा नहीं जा सकता है। हे मुनीश्वर! रामचरित्र अत्यंत अपार है। सौ करोड़ शेष जी भी उसे नहीं कह सकते। तथापि जैसा मैंने सुना है, वैसा वाणी के स्वामी/ प्रेरक और हाथ में धनुष लिये हुए प्रभु श्रीरामचन्द्र जी का स्मरण करके कहता हूं।
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