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आरक्षण नहीं, ये तो राजा का मुकुट बन गया है! 👑
क्या आरक्षण सचमुच 'आरक्षण' रह गया है, या यह 'राजा का मुकुट' बन गया है? 🧐 इस तस्वीर में कही गई बात आज हमारे देश के कई युवाओं के मन का सवाल है। जहाँ आरक्षण की मूल भावना सामाजिक और ऐतिहासिक रूप से पिछड़े वर्गों को समाज की मुख्यधारा में लाना था, वहीं अब यह पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होने वाला एक 'अधिकार' बनता जा रहा है।
पहले पिता, फिर बेटा और फिर पोता... यह सिलसिला कब तक चलेगा? क्या हम वास्तव में एक ऐसे भारत का निर्माण कर रहे हैं जहाँ योग्यता और प्रतिभा के बजाय जन्म के आधार पर अवसर तय होंगे? एक दलित का बेटा दलित ही रहेगा, यह सोच हमें किस ओर ले जा रही है? क्या हमने वास्तविक समानता के लक्ष्य को कहीं पीछे छोड़ दिया है?
आरक्षण का उद्देश्य था, सभी को समान पायदान पर लाना, न कि एक अनन्त व्यवस्था बनाना। हमें यह सोचने की ज़रूरत है कि क्या मौजूदा आरक्षण प्रणाली अपने उद्देश्यों को पूरा कर रही है, या यह केवल विभाजन और असंतोष बढ़ा रही है। क्या यह समय नहीं है कि हम आरक्षण के इस 'मुकुट' का पुनर्मूल्यांकन करें और एक ऐसे भारत की कल्पना करें जहाँ हर व्यक्ति को उसकी क्षमता के अनुसार अवसर मिलें, बिना किसी जातिगत बाधा के?
हम एक ऐसे भारत की कल्पना करते हैं जहाँ 'आरक्षण मुक्त भारत' हो, जहाँ हर नागरिक को उसकी मेहनत और प्रतिभा के आधार पर पहचान मिले। जहाँ किसी को भी अपने जन्म के कारण पीछे न रहना पड़े और न ही किसी को केवल जन्म के कारण असीमित लाभ मिलते रहें।
आप क्या चाहते हैं? क्या आप एक आरक्षण मुक्त भारत चाहते हैं जहाँ योग्यता ही एकमात्र मापदंड हो? अपनी राय कमेंट्स में बताएं! 👇
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