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आज के समय में सोशल मीडिया पर फेमस होना बहुत आसान है।
हॉस्पिटल में कोई कैमरे के सामने एक केला दे दे,
तो लोग उसे फरिश्ता, मसीहा और हीरो बना देते हैं।
लाइक्स, कमेंट्स और शेयरों की बारिश होने लगती है।
लेकिन ज़रा रुक कर सोचिए—
जो इंसान अपने शरीर का 40% लिवर दान कर देता है,
उसके लिए कितने लोग खड़े होते हैं?
लिवर दान करना कोई भावुक पल का फैसला नहीं होता।
इसमें दर्द है, ऑपरेशन है, जोखिम है,
हफ्तों की तकलीफ है और महीनों की रिकवरी है।
यह कोई दिखावे का काम नहीं,
यह शुद्ध कुर्बानी है।
ऐसे लोग कैमरे के सामने भाषण नहीं देते,
न पोस्ट लिखते हैं, न ट्रेंड चलाते हैं।
वे बस चुपचाप किसी की ज़िंदगी बचा देते हैं।
समस्या यह नहीं कि लोग केला देने वालों की मदद को सराहते हैं—
समस्या यह है कि
हम गहराई वाली इंसानियत को पहचानना भूल गए हैं।
आज ज़रूरत है लाइक देने से ज़्यादा
सम्मान देने की।
आज ज़रूरत है वायरल करने से ज़्यादा
सोच बदलने की।
यह पोस्ट लाइक माँगने के लिए नहीं है,
यह याद दिलाने के लिए है—
कि असली हीरो वही होते हैं
जो बिना शोर किए
किसी की ज़िंदगी बन जाते हैं।
हमें आप पर गर्व है।
और अगर यह पोस्ट आपको छू जाए,
तो एक लाइक नहीं,
एक सोच बदलना ही काफी है

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