आज़मगढ़ के एक सरकारी अस्पताल से इंसानियत को झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है। इलाज की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुँचा एक मरीज ऑक्सीजन की कमी से तड़पता रहा। उसकी साँसें उखड़ रही थीं, आँखों में डर था और चेहरे पर बेबसी। वह कभी नर्स की ओर देखता, कभी डॉक्टर को आवाज़ देता—बार-बार कहता रहा कि उसका दम घुट रहा है। लेकिन सफ़ेद कोट पहने जिम्मेदार लोग उसकी पीड़ा से ऐसे मुँह मोड़ते रहे जैसे वह कोई बोझ हो।
समय बीतता गया, मरीज की हालत और बिगड़ती गई। मदद की हर पुकार दीवारों से टकराकर लौट आई। जब सहनशक्ति जवाब दे गई, तब उस मरीज ने वह किया जो किसी सभ्य व्यवस्था में असंभव होना चाहिए था—वह खुद उठकर ऑक्सीजन सिलेंडर तक गया और अपने हाथों से ऑक्सीजन मास्क लगाया। यह दृश्य सिर्फ़ एक मरीज की जद्दोजहद नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का आईना है।
यह घटना सवाल पूछती है—क्या सरकारी अस्पतालों में ज़िंदगी की क़ीमत इतनी सस्ती हो गई है? क्या डॉक्टर और स्टाफ़ की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ फ़ाइलों तक सिमट गई है? इलाज मशीनों से नहीं, इंसानियत से शुरू होता है। अगर वही गायब हो जाए, तो अस्पताल सिर्फ़ इमारत बनकर रह जाते हैं। #worklife