यह तस्वीर किसी छोटे या पिछड़े इलाके की नहीं है, बल्कि देश की राजधानी दिल्ली के दिल की है। जहाँ रोज़ हजारों लोग आते-जाते हैं, वहीं कुछ गैर-जिम्मेदार लोग पान, गुटखा और तंबाकू खाकर ऐसी जगहों को गंदा कर देते हैं। एस्केलेटर पर कचरा, धूल, और हर तरफ थूके गए गुटखे के लाल निशान सिर्फ गंदगी नहीं, बल्कि हमारी सोच का आईना हैं।
सबसे दुख की बात यह है कि ये वही लोग होते हैं जो साफ-सुथरे कपड़े पहनते हैं, मोबाइल पर ज्ञान की बातें करते हैं, लेकिन सार्वजनिक जगह को अपना थूकदान समझ लेते हैं। क्या यह जगह सिर्फ सरकार की है? क्या इसे साफ रखना केवल कर्मचारियों की जिम्मेदारी है? नहीं। यह जगह हम सबकी है।
गुटखा खाकर दीवारें रंग देना, सीढ़ियाँ गंदी करना और फिर सफाई की उम्मीद करना सरासर गलत है। अगर हमें सच में “विश्वगुरु” बनना है, तो शुरुआत थूकना बंद करने से करनी होगी। वरना राजधानी चमकने की जगह यूँ ही बदनाम होती रहेगी।